सोमवार, 30 मार्च 2026

फेमिनिज्म

फेमिनिज़्म का मूल उद्देश्य स्त्री और पुरुष के बीच समान अधिकार, सम्मान और अवसर सुनिश्चित करना है। लेकिन समाज में अक्सर इसे गलत समझ लिया जाता है और इसके लिए स्त्रियों को ही दोषी ठहराया जाता है। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से तब दिखाई देती है जब आधुनिकता या बदलते सामाजिक व्यवहार को “अमर्यादा” से जोड़कर स्त्रियों पर आरोप लगाया जाता है।
समाज में यह धारणा बनी हुई है कि क्लबों में जाना, आधुनिक वस्त्र पहनना या खुलकर व्यवहार करना स्त्रियों के “अमर्यादित” होने का संकेत है। जबकि वास्तविकता यह है कि किसी व्यक्ति के कपड़े या बाहरी व्यवहार को ही उसके संस्कारों का पूर्ण मापदंड नहीं माना जा सकता। मैंने अक्सर देखा है कि पुरुष शराब के नशे में अनुचित व्यवहार करते हैं, घर में हिंसा करते हैं या सार्वजनिक स्थानों पर स्त्रियों के प्रति असम्मानजनक दृष्टि रखते हैं। इसके बावजूद ऐसे व्यवहार को समाज में कई बार सामान्य मान लिया जाता है।
“अमर्यादा” की अवधारणा को केवल कपड़ों या बाहरी आचरण तक सीमित करना एक संकीर्ण दृष्टिकोण है। संस्कार व्यक्ति के आचरण, विचारों, दूसरों के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी में प्रकट होते हैं। छोटे या बड़े कपड़े पहनना अपने आप में अमर्यादा नहीं है; बल्कि किसी की स्वतंत्रता को बाधित करना, उसके प्रति अपमानजनक व्यवहार करना और उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाना वास्तविक अमर्यादा है।
समाज में यह भी देखा जाता है कि सड़क पर स्त्रियों को घूरना या उनके प्रति असहज व्यवहार करना एक सामान्य प्रवृत्ति बन चुकी है, जिसे कई बार अनदेखा कर दिया जाता है। यह स्थिति दर्शाती है कि समस्या स्त्रियों के व्यवहार में नहीं, बल्कि उस मानसिकता में है जो उन्हें हर परिस्थिति में दोषी ठहराने की कोशिश करती है।
अतः फेमिनिज़्म को समझने की आवश्यकता है, न कि उसे दोष देने की। यह एक ऐसा विचार है जो समाज में व्याप्त असमानताओं और पूर्वाग्रहों को उजागर करता है और स्त्रियों के अधिकारों तथा सम्मान की बात करता है। समाधान स्त्रियों को सीमित करने में नहीं, बल्कि समाज की सोच को व्यापक और संतुलित बनाने में है।
अतः “अमर्यादा” की सही परिभाषा को समझना और उसे कपड़ों या बाहरी रूप से जोड़ने के बजाय व्यवहार और मानसिकता के आधार पर देखना आवश्यक है। तभी एक समान, न्यायपूर्ण और संतुलित समाज की स्थापना संभव हो सकती है।

गुरुवार, 26 मार्च 2026

मैं नव आरंभ की भाषा हु🙏

मैं दुखों की धुंध नहीं,
उषा की पहली काया हूँ,
अंधियारे के हर कोने में
जगमग करती माया हूँ।

मैं आँसू की थरथर बूंद नहीं,
मुस्कान की मधुर भाषा हूँ,
टूटे मन के निर्जन वन में
फिर से खिलती आशा हूँ।

मैं पीड़ा की परछाईं नहीं,
स्पर्श सुखद विश्वासों का,
सूनी राहों पर बिछ जाती
संगीत बनी उल्लासों का।

मैं सीमित क्षण की छाया नहीं,
असीमित विस्तारों की धारा,
हर हृदय में बहती चुपचाप
जीवन का उजियारा।

मैं हार नहीं, स्वीकार नहीं,
संघर्षों की परिभाषा हूँ,
मैं ही अंत नहीं जीवन का—
नव आरंभ की भाषा हूँ।

सोमवार, 23 मार्च 2026

समाधि का सुकून

थक गई हूँ इस जग की रीत से,
अब मन हटता हर एक प्रीत से।

भीड़ में रहकर भी खोई हूँ,
अब दूरी चाहूँ हर संगीत से।

न चाह रही, न आस कोई,
न मन में कोई प्यास नई,

बस चुप बैठी हूँ खुद के संग,
जैसे रुक गई हर साँस यहीं।

जहाँ न हँसी का शोर मिले,
न आँसू का कोई छोर मिले,

वो एक जगह है भीतर ही—
जहाँ बस शांत सा ठौर मिले।

अब जीत-हार सब एक लगे,
हर रिश्ता जैसे रेत लगे,

इस गहरे मौन के आँगन में,
समाधि ही सच्चा हेत लगे।

न कुछ पाना, न कुछ खोना,
न अपना कोई, न पराया होना,

इस सूने से सुंदर क्षण में—
बस खुद में खुद का समा जाना।

सोमवार, 9 मार्च 2026

प्रेम को परिभाषित कर दे ऐसा कोई विद्वान नहीं

प्रेम को कर दे परिभाषित — ऐसा कोई विद्वान नहीं,
ये एहसासों की गठरी है — इसका कोई व्याख्यान नहीं।
वेदों की ऋचाएँ मौन हुईं,
शास्त्रों की वाणी थक जाती है,
जब हृदय के गूढ़ प्रदेशों में
प्रेम स्वयं प्रकट हो जाता है।
न यह तर्कों से बँध पाता है,
न शब्दों से सीमित होता है,
यह तो आत्मा की उस धारा सा है
जो अनंत दिशाओं में बहता है।
जब प्रथम बार
किसी की स्मृति
मन के आकाश पर
चन्द्रमा-सी उदित होती है,
तभी हृदय के निर्जन वन में
प्रेम का अंकुर फूटता है।
कभी वह विरह की अग्नि बन
चेतना को तपाता है,
कभी मिलन की सुधा बनकर
जीवन को सरस बनाता है।
न उसका कोई आकार है,
न उसका कोई विधान है,
वह तो केवल अनुभूति है—
जो आत्मा से आत्मा तक
अदृश्य सेतु बन जाती है।
युगों से मुनि और कवि
उसके रहस्य को टटोलते रहे,
पर अंततः
मौन ही उनका अंतिम उत्तर बना।
क्योंकि प्रेम वह रहस्य है
जिसे जानना संभव है,
पर कहना संभव नहीं।
इसलिए आज भी
समय के विस्तृत आकाश में
एक ही सत्य गूंजता है—
प्रेम को कर दे परिभाषित — ऐसा कोई विद्वान नहीं,
ये एहसासों की गठरी है —
इसका कोई व्याख्यान नहीं।

मैं केवल अपने अस्तित्व की कहानी हु

मैं किसी से कम नहीं,
यह घोषणा करने नहीं आई हूँ।
न किसी की ऊँचाई नापने,
न किसी की छाया में
अपना कद तलाशने आई हूँ।
मैं तो बस
अपने होने की कहानी
स्वयं लिखने आई हूँ।
युगों से इतिहास की
पीली पड़ती पांडुलिपियों में
कितने ही नाम
अनलिखे रह गए,
कितनी ही आवाज़ें
समय की धूल में दब गईं।
मैं उन्हीं
अनकहे स्वरों की प्रतिध्वनि हूँ,
जो अब मौन नहीं रहना चाहती।
मेरे भीतर
एक आकाश है—
जिसे किसी सीमा की
ज़रूरत नहीं।
मेरे भीतर
एक अग्नि है—
जो किसी को भस्म करने नहीं,
बल्कि अपने अंधकार को
प्रकाश में बदलने के लिए जलती है।
मैं किसी से श्रेष्ठ होने की
लालसा लेकर नहीं आई,
पर स्वयं को तुच्छ मान लेने की
परंपरा भी स्वीकार नहीं करती।
मैंने सीखा है—
नदी की तरह बहना,
पर्वत की तरह अडिग रहना,
और आकाश की तरह
स्वतंत्र होना।
यदि मार्ग में
आँधियाँ भी आएँगी,
तो वे मेरी दिशा नहीं बदलेंगी,
वे केवल यह प्रमाण देंगी
कि मेरा दीपक अब भी जल रहा है।
क्योंकि मैं
प्रतिस्पर्धा की कहानी नहीं,
अस्तित्व की कहानी हूँ।
मैं किसी से कम नहीं,
यह साबित करने नहीं आई—
मैं तो बस
अपने जीवन की श्वेत धरती पर
अपने स्वप्नों की लिपि
स्वयं अंकित करने आई हूँ।
और जब समय
मेरे जीवन का अंतिम पृष्ठ पलटेगा,
तो वह देखेगा—
एक स्त्री थी
जो किसी से बेहतर बनने नहीं निकली थी,
पर अपने होने की कथा
इतनी गहरी लिख गई
कि समय भी
उसे मिटा न सका।

हां वही तो प्रेम है 🙏

मिलन के प्रथम क्षण से मृत्यु के अंतिम श्वास तक,
यदि हृदय का भाव अपरिवर्तित रहे — वही प्रेम है।
जो काल की प्रचंड धारा में भी अविचल रहे,
जो परिस्थितियों के प्रहार से भी न डिगे —
वही शाश्वत प्रेम है।
जब प्रथम बार
किसी की स्मृति बिना आमंत्रण
मन के आकाश पर उदित हो जाए,
और किसी का नाम
अंतरतम में प्रार्थना-सा बस जाए,
तभी प्रेम का बीज अंकुरित होता है।
प्रेम कोलाहल नहीं करता,
वह मौन की गहराइयों में जन्म लेता है।
जैसे निशा की निस्तब्धता में
दीपक की लौ स्वयं प्रकाशित हो उठे।
कालचक्र निरंतर घूमता है,
ऋतुएँ बदलती हैं,
यौवन की आभा क्षीण हो जाती है,
पर यदि हृदय की दिशा
अब भी उसी एक नाम की ओर प्रवाहित हो —
तो वही प्रेम है।
प्रेम अधिकार नहीं माँगता,
वह समर्पण का सौम्य आलोक है।
जहाँ अहं धीरे-धीरे विलीन हो जाता है,
और किसी का सुख
अपने अस्तित्व से अधिक प्रिय हो उठता है।
कभी वह मधुर स्मित बनकर जीवन को सुगंधित करता है,
कभी विरह बनकर आत्मा को तपाता है।
पर जो विरह में भी
किसी के कल्याण की कामना करे —
वही सच्चा प्रेम है।
जब आयु की संध्या समीप आती है,
और स्मृतियों का आकाश धुंधला होने लगता है,
यदि उसी धुंध में
एक ही छवि उज्ज्वल बनी रहे —
तो समझो प्रेम अभी भी जीवित है।
मिलन के प्रथम क्षण से
मृत्यु के अंतिम श्वास तक,
यदि हृदय का भाव
न काल से पराजित हो,
न परिस्थितियों से परिवर्तित —
तो वही प्रेम है।
वही प्रेम
जो आत्मा का शाश्वत आलोक है,
वही प्रेम
जो देह के नष्ट हो जाने पर भी
स्मृतियों के आकाश में
दीर्घकाल तक दीप्तिमान रहता है।