जहाँ रास्ते खुद हमारे कदमों को पहचानते,
और हर मोड़ पर एक हल्की-सी ख़ुशबू
हमारे आने का इशारा करती।
वहाँ अरमानों की महफ़िलें जलतीं—
रोशनियाँ धीमे-धीमे सांस लेतीं,
और हम दोनों उन रोशनियों के बीच
एक-दूसरे के साए को छूते हुए चलते।
तुम मेरा हाथ थामे रहते,
जैसे वक़्त को यक़ीन दिला रहे हो
कि अब कोई जुदाई का मौसम
हमारे हिस्से नहीं लिखा।
कभी आसमान मेरी हथेली पर उतर आता,
अपनी नीली चुप्पियों के साथ,
कभी ज़मीन मेरे पाँव सहलाकर
कहती—रुको, थोड़ा ठहरो,
यह सफ़र भी तुम्हारा ही हिस्सा है।
और मैं…
मैं उन दोनों के बीच खड़ी हो
तुम्हें महसूस करती—
जैसे दुनिया का हर हिस्सा
मेरी धड़कनों की भाषा समझता हो।
एहसास भी ज़िंदा रहते—
सूखे पत्तों की तरह टूटते हुए नहीं,
बल्कि ओस की बूंदों की तरह चमकते हुए,
हर भोर में नया जन्म लेते हुए।
कभी अगर मेरी आँखें भर भी जातीं,
तो आँसू मेरे नहीं लगते—
वो तुम्हारी उँगलियों पर गिरकर
अपना नाम खो देते,
और सिर्फ़ एक नर्म-सी खामोशी रह जाती
जो कहती—
“यह रिश्ता शब्दों से बड़ा है।”
और मेरी आँखें…
वो तुम्हारे चेहरे को पढ़ना सीख जातीं,
हर मुस्कान का मतलब,
हर थकान का राज़,
हर खामोशी की परत—
सब समझने लगतीं।
फिर एक दिन हम
उसी अनदेखी मंज़िल पर खड़े होते
जहाँ सपने थकते नहीं,
जहाँ ख्वाहिशें बिखरती नहीं,
जहाँ मोहब्बत—बस मोहब्बत होती है
और तुम…
मेरे हाथों की लकीरों में
अपना घर बना लेते।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें