सोमवार, 24 नवंबर 2025

पड़ोसियों

पड़ोसियों,
तुम्हारी ऊँची दीवारों से मुझे क्या लेना?
मैं तो उन लोगों को खोजती हूँ
जो दिल की खिड़कियाँ खुली रखते हैं।

यहाँ लोग घरों की ऊँचाई से पहचान पूछते हैं,
चरित्र की नींव से नहीं;
नाम के बोर्ड देखते हैं,
नाम की अच्छाई नहीं।
पर मैं उस भीड़ में शामिल नहीं।

मुझे दिखावे का कोई संबंध नहीं चाहिए,
न कपड़ों की कीमत पूछने वाले,
न रिश्तों की नीलामी देखने वाले—
मैं तो बस इतना चाहती हूँ
कि पड़ोसी पड़ोसी रहे,
मुक़ाबले का मैदान नहीं।

बाहर की बत्तियाँ चाहे जितनी चमकें,
अगर भीतर अँधेरा है—
तो हवेली भी तन्हा है।
और छोटा सा घर,
अगर हँसी से भरा हो
तो किराए पर भी जन्नत लगता है।

पड़ोसियों!
तुम्हारा सजधज कर आना अच्छा है,
पर एक बार बिखर कर भी आओ—
ताकि पता चले
रिश्ते संवारने से बनते हैं,
सजावट से नहीं।

मैं हाथ बढ़ाऊँगी तो नेकदिली से,
न कि दिखावे के रेशमी दस्ताने पहनकर;
मैं मुस्कान दूँगी तो सच्ची,
न कि फोटो खिंचवाने वाली जबरन हँसी।

मैंने ठान लिया है—
दिल की दौलत नहीं तो रिश्ता भी नहीं;
न लेन-देन के तराज़ू,
न शान-शौकत के बहाने;
जो पास आए— दिल से आए,
वरना दरवाज़े बंद नहीं
पर उम्मीदें सिमट जाएँगी।

क्योंकि
रिश्तों की असल खूबसूरती
चेहरों पर नहीं,
नियत में दिखाई देती है।

और मुझे
ऐसे लोग चाहिए आसपास,
जो दिखें नहीं—
पर महसूस हों।

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