कि तुम मेरी ख़्वाहिशों को पढ़ो,
बिना मेरे बोले,
जैसे हवा शाखों के झुकाव से समझ जाती है
कौन-सा पत्ता उदास है
और कौन-सा उड़ना चाहता है।
कभी ऐसा हो—
कि तुम मेरी चुप्पियों को छूकर कहो,
"यहाँ धूल नहीं,
किसी अधूरे सपने की परतें हैं…"
और फिर धीरे से
उन्हें अपने शब्दों की हथेली पर बिठाकर
आज़ादी दे दो।
कभी ऐसा हो—
कि मेरे भीतर की रात को तुम
अपनी मुस्कान की एक किरण भेजो,
और मैं हैरान हो जाऊँ
कि उजाला भी किसी का इंतज़ार करता है।
कभी ऐसा हो—
कि तुम मेरे मन की गलियों में चलो
और हर मोड़ पर
एक नया रंग पाओ—
कहीं बच्चा-सा उछलता उत्साह,
कहीं बूढ़े-सा बैठे सपने,
कहीं तुम्हारे नाम का
अनकहा इकरार।
कभी ऐसा भी हो—
कि मैं तुम्हें न पुकारूँ,
पर तुम फिर भी लौट आओ,
क्योंकि दिल की ख़ामोश पुकारें
ज़ुबान की मोहताज नहीं होतीं।
कभी ऐसा हो—
कि तुम मेरे डर, मेरे टूटे पलों,
मेरी हँसी के पीछे छिपी थकान
सब पढ़ लो—
और फिर कहो,
"तुम्हारी कहानी अधूरी नहीं,
बस कुछ पन्ने मेरी वजह से
सफ़ेद पड़े हैं।"
कभी ऐसा हो—
कि मेरी रूह के कोरों पर जमी
पुरानी दरारों को तुम
न उधेड़ो,
बस अपनी मौजूदगी से
उन्हें समझ लो।
कभी ऐसा हो…
कि हम दोनों एक-दूसरे को
किताब की तरह न पढ़ें,
बल्कि कविता की तरह महसूस करें—
जहाँ अर्थ शब्दों में नहीं,
आँखों की भीगी चमक में छिपा होता है।
कभी ऐसा हो—
कि तुम मेरे ख्वाहिशों को पढ़ो
और मैं तुम्हारे सन्नाटों को,
और दोनों मिलकर
एक ऐसी दास्तान लिख दें
जो किसी ने न लिखी हो,
न पढ़ी हो—
सिर्फ महसूस की हो।
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