किसी की दृष्टि की मेहर से नहीं।
मैंने अपना आकाश खुद बुना है,
उन सीमाओं के धागों से,
जिन्हें समाज ने कभी दीवार समझा था।
मेरी पहचान किसी नाम की परछाई नहीं,
मैं वो रौशनी हूँ
जो परछाइयों से लड़कर जन्म लेती है।
मेरी जुबान पर अब डर नहीं,
मेरे शब्द अब समर्पण नहीं — संकल्प हैं।
मैंने अपनी चुप्पी से भी इतिहास लिखा है,
मेरे आँसुओं ने भी अर्थ गढ़े हैं,
जहाँ लोग समझे कमज़ोरी,
वहीं से मैंने अपना सामर्थ्य जन्माया है।
किसी के नजरिये ने मुझे कभी पूरा नहीं देखा,
क्योंकि मैं सीमाओं में समाने के लिए नहीं बनी।
मैं तो हर युग में नए अर्थों में जन्म लेती हूँ,
कभी मीरा की तरह प्रश्न करती हूँ,
कभी झाँसी की तरह उत्तर बन जाती हूँ।
मेरा अस्तित्व मेरे कर्मों की सुगंध है,
किसी की प्रशंसा का इत्र नहीं।
मैंने अपने घावों में भी कमल खिलाए हैं,
और अपनी राख से ही रंग रचे हैं।
मैं वही स्त्री हूँ —
जो अब दर्पण नहीं देखती,
क्योंकि मुझे अब खुद को सिद्ध नहीं करना,
मुझे बस होना है,
अपने कर्मों में... अपने सत्य में...
अपने अस्तित्व में।
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