गुरुवार, 29 सितंबर 2016

मुझे आज खुद को गढ़ना पड़ेगा

खुद को लिखूँ खुद को पढूँ
कलम चाहती है नया कुछ गढ़ूं
विचारों की शक्ति धूमिल सी है
मन कुछ कुछ बोझिल सी है।।

नई चेतना मन को आतुर करे है
पुरवायियों में रंग से भरे है
नया दिन निकलने को व्याकुल खड़ा है
मगर रास्ता भी लम्बा बड़ा है।।

कही धूप है तो कही छाँव भी है
शहर में भटकती रूह की गाँव भी है
वहाँ चैन जन्नत की मिलती बहुत है
मगर रिश्तो में मिलावट बहुत है।।

कोई आज में जीता है कोई कल को रोता है
कोई खोकर पाता है कोई पाकर खोता है
रोने की सबको है आदत पुरानी
यही बात सदियों से बनती कहानी।।

मुझे आज खुद को पढ़ना पड़ेगा
कोई राह मुझको भी गढ़ना पड़ेगा
छोड़ किस्से कहानी की बातो को अब तो
एक नया धुन से आगे बढ़ना पड़ेगा।।

#सच_है_की_हम_बदलेंगे_युग_बदलेगा

शुभरात्री

रविवार, 11 सितंबर 2016

प्रश्न

दिन के उजास में
या शाम की गहराई में
लोगो की भीड़ में
या गजब की तन्हाई में
दिल ढूँढता फिरता है
मेरा अक्स किधर है
जो मुझको चला रहा है
वो सख्श किधर है.....
मुझमेँ अगर मै हूँ
तो मै ऐसी क्यों हूँ
मुझमेँ अगर तू है
तो तू दीखता क्यों नही
मोल है मेरा बेमोल तू है
तो बिकती सिर्फ मै क्यों
तू बिकता क्यों नही....
प्रश्न उठता है जेहन में
जवाब भी मिलना चाहिए
जिंदगी में वक्त का हिसाब
भी मिलना चाहिए....
यूँ तो अजनबी राहें भी
मेरे साथ साथ चलती है
शायद इसी लिए हर
ख्वाहिशे पिघलती है....
दुनियां फरेब है या
नजरों का धोखा है
चल जी ले जिंदगी
तुझे किसने रोका है..
मै मुझमे नही तू
तुझमें नही..
पर सच तो यही है
तू अक्स है मेरा
और मै परछाई हु तेरी...

दिव्या पाण्डेय ऋतू
10-09-2016

बुधवार, 7 सितंबर 2016

मन की बात

जब कोई दर्द गहराता है
तो गजल बनती है
अश्क पलकों में थम जाता है
तो गजल बनती है
नावजिशो का दौर तो
चलता ही रहता है
लेकिन जब कोई बातो से
चोट खाता है तो
गजल बनती है
चंद दर्द के टुकड़े
पैमाने में मिला के पी लूँ अगर
नशा हो जाए
नशा जब दर्द से टकराता है
तो गजल बनती है।
मुस्कुराहट की झुरमुट से
झाक कर देखो
साँस जब काटों से छन के
आये जाए
दिल में एक तड़प से उठे लेकिन
वक्त मरहम लगाता है
तो गजल बनती है।
#शुभ_दिवस_मित्रों