जिसे अपनी कहानियों में मैंने मार डाला था —
कलम की धार से कूच कर दिया,
काग़ज़ के युद्ध में उसे खत्म कर दिया,
पर नींद के दरवाजे बंद करना
मेरे वश में कभी था ही नहीं।
रात के सन्नाटे में वो फिर लौट आता है,
घावों पर धूल झाड़कर खड़ा हो जाता है—
“लेखिका, क्या वाक़ई मैं इतना बुरा था?”
उसकी भारी आवाज़
मेरे अंतर का वीरान कमरा हिला जाती है।
मैं घबरा जाती हूं
उसकी आंखों के भीतर की शिकायतों से,
वो आंखें—जो न पाठकों ने देखीं, न दुनिया ने पढ़ीं,
पर मैंने लिखते समय उन्हें महसूस किया था।
वो कहता है—
“तुम्हारी कहानी ने मुझे विलेन कहा,
पर सच तो यह है कि तुमने कभी
मेरी मजबूरियों को लिखा ही नहीं।
मेरे अंधेरों में भी कुछ जुगनू थे,
तुमने उन्हें अस्तित्व से मिटा दिया।”
मैं चाहकर भी जवाब नहीं दे पाती।
क्योंकि सच यह है—
मैंने उसे इसलिए मारा था
क्योंकि वो इतना सच्चा, इतना असली था
कि अगर जिंदा छोड़ देती,
तो पूरी कहानी उसकी हो जाती।
वो किरदार आज भी मेरे सपनों में आता है—
न नाराज़, न गुस्से में,
बस शांत…
चुपचाप, जैसे बचे हुए शब्दों का कोई अनाथ।
कभी दरवाज़े पर बैठकर धुआं बन जाता है,
कभी मेरे तकिए के पास बैठकर पूछता है—
“क्या अगले जन्म में मुझे हीरो बनने दोगी?
या फिर तुम्हारी कहानियों के जंगल में
मैं हमेशा भटकता रहूंगा
बुराई की पहचान बनकर?”
और मैं…
मैं सुबह उठकर तय नहीं कर पाती
कि डर उसके लौट आने का है,
या फिर इस बात का—
कि शायद वह सच में
मुझसे बेहतर इंसान था
और मैं ही उसकी कहानी लिखने के लायक नहीं थी।
इसलिए अब हर नई कहानी लिखते समय
मैं पात्रों से माफी मांग लेती हूं —
क्योंकि एक किरदार जिसे मैंने मार डाला था
आज भी जीवित है,
मेरे सपनों में,
मेरी आत्मा की अदालत में,
और मेरी कलम उससे हार गई है। ✍️
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