सोमवार, 24 नवंबर 2025

इश्क जो बेचैन रखे



जो मिल जाए बिना माँगे,
वो ज़रूरी तो है, पर मोहब्बत नहीं होती…
इश्क़ तो वो सच्ची आग है,
जो दिल के भीतर चुपचाप, बेआवाज़ जलती होती।

जो चैन छीन ले रातों का,
और करवटों का बोझ बढ़ा दे—
जो बारिश को भी आँखों की तरह
टपकने में न शर्माने दे…
वही इश्क़ है!

जो नमकीन कर दे होंठों से गिरते
हर एक खामोश आँसू को—
और फिर उन आँसुओं में भी
तुम्हारा चेहरा दिखाई दे…
वही इश्क़ है!

जो दिल की धड़कनों को
अचानक से घबराहट में बदल दे,
और फिर उसी धड़कन के
बेचैन संगीत पर जीवन नाच उठे—
वही इश्क़ है!

मोहब्बत वह नहीं
जो पा लेने से पूरी हो जाए,
मोहब्बत वह है
जो मिलकर भी आधी रह जाए…
और हर आधापन में
पूर्णता का वादा छिपा जाए…
वही इश्क़ है!

जो तन्हाई में हाथ थाम ले,
पर भीड़ में पहचान छुपा ले—
जो हर जुदाई में
मिलन का ख्वाब दिखाए,
हर ख्वाब में बेचैनी जगाए…
वही इश्क़ है!

इश्क़ वह सफ़र है दिव्या—
जो मंज़िल मिलने पर ख़त्म हो जाए
तो वह कभी इश्क़ था ही नहीं…
असली इश्क़ तो वह है
जो हर रोज़ नया तड़पाए,
हर रोज़ नया जीना सिखाए,
और हर कल कहे—
“आज से थोड़ा और इश्क़…”

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