वो अकेली है —
पर भीतर एक भीड़ रहती है,
सपनों की, संघर्षों की,
और अधूरे सवालों की।
वो चलती है —
न साथ में कोई नाम है,
न कंधे पर किसी का हाथ,
पर उसके कदमों की आवाज़
धरती तक को हिला जाती है।
उसकी चुप्पी कोई कमजोरी नहीं,
वो तूफ़ान है —
जो शब्दों से नहीं,
अपने कर्मों से बोलती है।
कभी उसने माँ के आँचल से हिम्मत सीखी,
कभी उसने दर्द के काँटों से सीना सींचा,
अब उसकी आँखों में नमी नहीं,
बस चमक है —
जो रोशनी नहीं, दिशा बनाती है।
वो जानती है,
हर लड़ाई में जीतना ज़रूरी नहीं,
पर हर बार गिरकर उठना,
वो उसका धर्म है, उसकी रीति है।
लोग कहते हैं —
“अकेली औरत अधूरी होती है।”
वो मुस्कुराती है —
क्योंकि उसे पता है,
जो खुद में पूर्ण है,
उसे किसी सहारे की ज़रूरत नहीं होती।
वो “अकेली” नहीं,
एक “युग” है —
जिसकी शुरुआत उसने खुद से की है,
और अंत किसी को दिखेगा नहीं।
क्योंकि जब एक स्त्री अकेली होकर सशक्त होती है,
तो ब्रह्मांड तक उसका नाम लिखता है —
“वो — जो खुद अपनी वजह है।”
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें