सोमवार, 24 नवंबर 2025

मैं एक दरकती धूप ही सही



मैं एक दरकती धूप ही सही,
पर अँधेरों की औक़ात याद दिला देती हूँ,
टूटे हुए सूरज की किरण बनकर भी,
सुबहों को नया रास्ता दिखा देती हूँ।

मैं नर्म नहीं —
चटखते काँच की तरह चुभ सकती हूँ,
दिल की खिड़कियों पर जमी उदासी को
छीलकर सच्चाई कह सकती हूँ।

मैं एक दरकती धूप ही सही,
पर क़ैद बादलों के काँधे से फिसलकर
किसी उदास चेहरे पर मुस्कान रख आती हूँ,
चाहे एक पल के लिए ही सही।

मेरी किरणों में हल्का-सा दर्द है,
पर ये दर्द रोशनी बनकर जीना सिखाता है,
जो बिखर जाए वो भी चमक सकता है—
ये अहसास दुनिया को दिखाता है।

मैं टूटन में भी चमकती रहूँगी,
चाहे आँखों में रातें गहरी हों—
मैं एक दरकती धूप ही सही,
मगर उम्मीदों की आख़िरी पहरी हूँ। 

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