शनिवार, 15 नवंबर 2025

मै तुम्हे खोना नहीं चाहता

मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता,
क्योंकि खोना सिर्फ़ बिछड़ना नहीं होता—
खोना,
दिल के भीतर बसते किसी शहर के
अचानक उजड़ जाने की पीड़ा होती है....

तुम्हें खो देना
ऐसा होगा जैसे
मेरे भीतर की रोशनी
एक-एक कर बुझती चली जाए…
और मैं
अपनी ही परछाईं से डरने लगूँ.....

मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता,
क्योंकि तुम वह एक कंधा हो
जहाँ मेरी थकी हुई उम्मीद
आकर साँस लेती है.....

तुम वह नाम हो
जिसके बिना मेरी दुआओं में भी
एक खालीपन सा गूँजता है…
जैसे कोई मंदिर
घंटी के बिना खड़ा हो,
जैसे कोई आँसू
रोए बिना बह जाए.....

मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता,
क्योंकि तुमसे जुड़े सपने
मेरी नींद नहीं,
मेरी जिंदगी का हिस्सा हैं।
तुम्हारी हँसी—
मेरे दिनों की धूप है
और तुम्हारी ख़ामोशी—
मेरी रातों की चादर.....

तुम्हें खो देना
जैसे मेरी दुनिया के नक्शे से
सारे रास्ते मिट जाएँ…
और मैं हर मोड़ पर
बस तुम्हारा नाम पुकारता रहूँ
धान के खेतों में खोई
किसी पगडंडी की तरह......

मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता,
क्योंकि तुम चले गए
तो मेरा मन
अपनी ही धड़कनों को
अजनबी समझने लगेगा......

तुम रहो—
मेरी साँस की तरह,
मेरी धड़कन की तरह,
मेरी सुबह की तरह......

तुम रहो—
क्योंकि तुम हो
तो मैं पूरा हूँ,
वरना मैं
बस एक ऐसा अधूरा पन्ना हूँ
जिस पर कोई आख़िरी पंक्ति लिखना
भूल गया हो......

मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता…
कभी नहीं।
क्योंकि तुम
मेरे आज की शांति,
मेरे कल की उम्मीद,
और मेरे हर आने वाले पल की
सबसे खूबसूरत वजह हो......

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें