शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

मैने खुद को चुना

भीड़ में अनगिनत चेहरे मुस्कुराते मिले,
पर मेरी थकान, मेरी चुप्पियाँ — कोई पढ़ न सका।
सबको मेरे होने का फ़ायदा समझ आता था,
पर मेरे ना होने का दर्द कोई समझ न सका।

दुनिया के दिलों की गलियों में बहुत खोजा,
पर मेरे जैसा कोई न मिला —
जो टूटकर भी मुस्कुराए,
और बिखरकर भी खुद को समेट ले।

तब थमकर एहसास हुआ—
सबसे सच्ची हमराज़ मैं ही हूँ।
मेरे ज़ख्मों की भाषा सिर्फ मुझे आती है,
मेरी ख़ामोशी का अर्थ सिर्फ मेरे दिल ने जाना है।

इसीलिए मैंने निर्णय लिया—
किसी से पहचान उधार नहीं लूँगी,
किसी की परछाई में अपना आकार नहीं ढूँढूँगी,
किसी उम्मीद के सहारे खुद को बंधक नहीं करूँगी।

मैंने खुद को चुना —
क्योंकि मैं ही वो आईना हूँ
जो मेरी पीड़ा के आँसू भी पहचानता है
और मेरे सपनों पर मुस्कान भी रखता है।

मैंने खुद को चुना —
क्योंकि मैं ही वो ताक़त हूँ
जो रात की चुप्पियों में मुझे सहारा देती है
और सुबह की धूप में फिर से खड़ा कर देती है।

दुनिया तालियों की गूँज पर प्यार करती है,
और मैं अपनी हारों में भी खुद से प्यार करना जानती हूँ।

अब मैं मंज़िलों का इंतज़ार नहीं करती—
मंज़िलें मेरी रफ़्तार पहचानें, ये ज़रूरी है।
अब मैं रिश्तों के तराजू में खुद को नहीं तोलती—
मेरी कीमत मेरे विश्वास से तय होगी।

मैंने खुद को चुना —
क्योंकि मेरे जैसा कोई और कभी नहीं होगा,
और मेरी कहानी का सबसे खूबसूरत किरदार
मैं ही हूँ…
मैं ही रहूँगी।

राहें कैसी भी हों — कठोर या सरल,
मैं चलूँगी अपने कदमों की स्वायत्तता पर।
मैं खिलूँगी अपने साहस की ऋतु में,
मैं उठूँगी हर गिरावट के बाद और ऊँची।

दुनिया बदले, रिश्ते बदले, मौसम बदले—
पर मैं नहीं बदलूँगी।
क्योंकि मैंने खुद को चुना है,
खुद को अपनाया है,
और अब खुद को खोने की कोई गुंजाइश नहीं।

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