ख़्वाहिशों की सूखी डालियों ने
जैसे अचानक अंगारों-सा साँस ले लिया।
दो धधकती लकड़ियों को
अभी-अभी हमने फूँक से शांत किया है—
पर राख अभी तक गर्म है।
साल गुज़रा तो यूँ लगा
जैसे कोयले-से पल बिखर गए हों—
कुछ काले होकर बुझ गये,
कुछ अब भी चुपचाप दहक रहे हैं।
और जब समय ने
इन यादों को हथेलियों पर समेटना चाहा,
उंगलियों पर फफोले पड़ गए…
क्योंकि जो जला हो मन में,
वो हाथों से कहीं नहीं उठता।
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