मैं एक मुरझाई कली,
जिसे तेरी धूप का इंतज़ार है।
तेरे बिना मैं हूँ भी,
पर जैसे साँस बिना बहार है।
तू है तो मैं रंग हूँ,
तू नहीं, तो बस एक अधूरी तरंग हूँ।
मैं बादलों-सी मनमौजी,
कभी गाती, कभी बरसती,
सपनों के पर लगाकर
क्षितिज से भी आगे निकलती।
मेरा हर अंश तेरा ही प्रतिध्वनि बन जाता,
तेरे शब्दों में ही मेरा संगीत समा जाता।
तेरी हँसी की परछाई
मेरे होंठों पे सज जाती,
बेख़्याली में भी तू
मेरे हर खयाल में उतर आती।
कभी लगता —
हम कभी मिले ही नहीं,
पर कभी बिछड़े भी नहीं।
जैसे हम सृष्टि की पहली साँस से साथ हैं,
तू हवा बनकर मेरे चारों ओर बहता है,
और मैं साँस बनकर
तेरे भीतर जीवित रहती हूँ।
तेरे बिना मैं हूँ,
पर अस्तित्व मेरा मौन है।
तू है तो मैं पहचान हूँ,
तेरे बिना मैं केवल एक नाम हूँ।
मैं रेत की वो चमकती ज़मीं,
जिसका कोई आसमान नहीं।
बिखरती हूँ बाहर,
पर भीतर की स्थिरता तेरे बिना कहीं नहीं।
तू है तो मैं हूँ,
तेरे बिन —
मैं हूँ भी, पर मैं हूँ ही नहीं।
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