तुम्हारे नाम की धड़कन सीख ले,
तो समझ लेना — तुम सिर्फ जीते नहीं,
अनंत में गूंजना सीख गए हो।
क्योंकि कलाकार तुम्हें देखता नहीं,
तुम्हें अपने भीतर जन्म देता है।
वो तुम्हें आँखों से नहीं,
अपनी आत्मा से तराशता है —
शब्दों के संग, रंगों के संग,
समय की हर धड़कती रेखा के संग।
तुम्हारी हँसी उसके छंदों में खिल जाती है,
तुम्हारी नज़रें उसके कैनवास का आसमान बन जाती हैं।
तुम्हारा होना उसकी रचना नहीं,
उसका विश्वास बन जाता है।
और जब एक दिन वो संसार से विदा भी हो जाए,
उसकी कलाकृतियों की सांसों में,
उसकी कविताओं की धड़कनों में
तुम अब भी धूप की तरह चमकते मिलोगे।
क्योंकि कलाकार का प्रेम क्षण नहीं होता,
वो अस्तित्व होता है —
जो मिट्टी से नहीं, अमरता से गढ़ा जाता है।
और जिस दिन तुम्हें कोई कलाकार चाहे,
समझ लेना —
तुम वक़्त की पकड़ से आज़ाद हो चुके हो।
तुम्हें भूलना मनुष्य के बस की बात नहीं।
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