काग़ज़ पर नहीं, समय की रगों में,
जहाँ शब्द बूढ़े नहीं होते,
जहाँ स्याही भी धड़कनों से चलती है।
हर कविता मेरा अधूरा पुनर्जन्म है—
एक जन्म जो शब्दों में साँस लेता है,
एक मृत्यु जो शून्य में खिलती है।
मैं नहीं मरना चाहती,
बस मिटकर फैल जाना चाहती हूँ
हर उस साँस में जो अर्थ तलाशती है।
मेरे शब्दों को मत बाँधो जिल्दों में,
छोड़ दो उन्हें उड़ने को,
धूल की तरह, हवा के साथ—
कभी किसी किसान की हथेली पर उतरें,
कभी किसी कवि के दिल में बीज बन जाएँ।
मैं प्रसिद्ध नहीं होना चाहती,
मैं अनुनाद बनना चाहती हूँ—
जब कोई और लिखे “मैं टूटी हूँ”,
तो उसके शब्दों में मेरा अंश गूँजे।
छाप दो मुझे
बारिश की पहली गंध में,
किसी पुराने ख़त के किनारे,
किसी अधूरे गीत की खामोशी में।
और जब कोई पढ़े—
तो उसे महसूस हो,
कि ये पंक्तियाँ नहीं,
किसी की आत्मा का उजाला बोल रहा है।
मैं अमर नहीं हूँ अभी,
पर मेरी कविताएँ हैं…
और जब तुम उन्हें पढ़ते हो,
तुम भी थोड़े-से अमर हो जाते हो।
लेखिका दिव्या पाण्डेय
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