साथ ही खड़े, पर भीतर से चुपचाप झरते हुए।
क़रीबी का शोर जितना बढ़ता है,
अंतर की खामोशियाँ उतनी ही साफ़ सुनाई देने लगती हैं।
हर बात के पीछे एक अधूरा सत्य छिप जाता है,
हर मुस्कान में एक थकी हुई समझदारी,
और हर स्पर्श में अनकहा-सा थकान भरा संतुलन।
ऐसे में दूरियाँ कटु नहीं लगतीं,
बल्कि एक विनम्र शांति बन जाती हैं —
जहाँ सम्मान बिखरने से पहले संभल जाता है।
दूरी सिखाती है कि प्रेम का अर्थ समीप होना नहीं,
और साथ का मतलब छाया की तरह पीछे चलना भी नहीं।
कभी-कभी मनाही नहीं… बस थोड़ी-सी जगह चाहिए होती है,
ताकि आत्मा फिर से साँस ले सके।
दरारें भीतर को खोखला करती हैं,
पर दूरी?
वह मर्यादा का रेशमी परदा है —
जो रिश्ते को टूटने से नहीं,
चूर-चूर होने से बचा लेता है।
कुछ रिश्ते पास रहकर घुटते हैं,
थोड़ा अलग होकर खिल उठते हैं।
क्योंकि हर नज़दीकी प्यार नहीं होती,
और हर दूरी विरह नहीं।
कभी-कभी थोड़ा-सा अलग रह जाना,
टूटकर बिखर जाने से कहीं ज़्यादा पवित्र होता है।
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