किस मोह में डूबी रहती हो?
ये मोहब्बत भरी पंक्तियाँ किसके नाम लिखती रहती हो?
मैं मुस्कुराई…
अपनी कलम को उंगलियों में थामा,
और मीरा की पांवों में झनकती पायल-सी
कृष्ण-प्रेम की धुन में मैं भी खो सी गई।
कुछ प्रेम देह का नहीं,
आत्मा की प्यास बुझाते हैं—
न पाने का लोभ,
न खोने का भय,
बस अपनत्व की ऊष्मा में
दिल के कोने को गले लगाते हैं।
ये शब्द…
इत्र की तरह मेरी रूह में उतरते हैं,
मन को महका जाते हैं
जब भी इनके पास चली जाती हूँ।
कई बार चाहा इन्हें भूल जाना,
दुनियावी शोर में ख़ुद को उलझा लेना,
पर ये पंक्तियाँ, ये भाव, ये कलम
हर बार मुझे अपनी ओर खींच लाते हैं।
मैं अपूर्ण हूँ इनके बिना—
और ये मुझे बार-बार
मेरा ही रूप लौटा जाते हैं।
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