शायद पहाड़ की कठोरता ही वजह बनी,
कि नदियाँ उसे छोड़ गईं बह जाने के लिए।
पर कौन जानता है —
जुदाई कभी-कभी सज़ा नहीं, सबक होती है।
नदियाँ जब मुड़कर देखती हैं,
तो उन्हें एहसास होता है,
पहाड़ की चुप्पी में भी एक अपनापन था,
जिसे वो बहाव में खो आईं।
और वो पहाड़ —
जिसे सबने अडिग कहा,
वो भी कभी किसी नाज़ुक धारा के स्पर्श से
पिघलना चाहता था...
पर अब वो जान गया है —
छूट जाना हमेशा हार नहीं होता,
कभी-कभी बिछड़कर भी
कोई और मज़बूत हो जाता है।
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