बहुत बारीकी से समझना —
आदमी अब आदमी नहीं रहा,
चेहरे वही हैं, पर नक़ाब नए,
हर मुस्कान में मुनाफ़ा है छिपा हुआ।
रिश्ते अब दिलों से नहीं,
ज़रूरतों से बुने जाते हैं,
जहाँ अपनापन मापा जाता है,
वहाँ स्नेह अक्सर बिक जाते हैं।
वो दोस्ती भी अब तौलता है,
कब क्या फ़ायदा देगी उसे,
और प्रेम का सौदा भी करता है,
मिठास के पीछे कोई मक़सद रखकर।
कभी शब्दों से ख़रीदता है भरोसा,
कभी ख़ामोशी से बेच देता है दिल,
इंसान अब आईना नहीं रहा,
वो अपनी ही परछाई से खेलता है खिल।
बहुत बारीकी से समझना —
यह दौर, यह लोग, यह रीतें,
आदमी अब सिर्फ़ जी नहीं रहा,
वो हर रिश्ते में व्यापार कर रहा है।
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