सोमवार, 1 दिसंबर 2025

शून्य होती अपेक्षाएं____स्त्री की शांति

स्त्री जब जन्म लेती है
तभी से सीख जाती है
पाना नहीं—देना,
माँगना नहीं—सहेजना,
चाहना नहीं—चुप रहना,
और सहना… बस सहते जाना।

उम्मीदों के पहाड़
उसके कंधों पर रखे जाते हैं—
घर की, समाज की,
सबकी ख़ुशियों की,
पर उसकी अपनी ख़ुशी?
उसके हिस्से अक्सर ग़ायब।

फिर भी वह हँसती है,
थाली में पहला निवाला सबको देती है,
अपनी इच्छाएँ परोसकर
दूसरों की भूख मिटाती है—
और भीतर की भूख
अधूरी रहती है हर दिन।

प्रेम में भी
वह पूरी उतरती है—
पर उसके हिस्से में
अधूरी वादे, आधे सच
और आधी रात में रोते तकिए आते हैं।

और फिर किसी मोड़ पर
वह थक जाती है—
भागकर नहीं,
टूटकर नहीं,
बल्कि
लौटकर… “खुद” के पास।

उस दिन वह बैठती है
आईने के सामने नहीं,
अपने आत्मा के सामने—
और कहती है,
“मैंने किसे नहीं दिया?
और बदले में माँगा क्या?”

जवाब आता है—
“बस थोड़ा सा सुनना,
थोड़ा सा समझना,
थोड़ी सी कद्र।”

बस इतना ही?
हाँ… बस इतना ही।
फिर भी न मिला।

तभी उसके भीतर
एक अग्नि और एक शांति
साथ-साथ जन्म लेती है।

वह निर्णय करती है—
अब किसी से कुछ नहीं माँगूँगी,
न प्रेम,
न समय,
न समझ,
न ठहराव।

और जैसे ही
अपेक्षाएँ शून्य होती हैं—
स्त्री बदलती नहीं,
स्त्री जागती है।

अब वह वही करती है
जो हमेशा से जानती थी—
देना।
पर अब देने में
कोई ग़ुज़ारिश नहीं,
कोई लिखी हुई शर्त नहीं,
कोई छुपी हुई याचना नहीं।

अब उसका प्रेम
उसकी शक्ति है—
कमज़ोरी नहीं।

अब उसके आँसू
पराजय नहीं—
परिष्कार हैं।

अब उसका मौन
दर्द नहीं—
स्वाभिमान है।

दुनिया वही है—
लोग वही हैं,
पर स्त्री बदली है,
क्योंकि उसने सीखा है—
“बिना चाह की मुस्कान
सबसे सुंदर होती है।”

अब कोई उसका सब कुछ नहीं—
और कोई उसका कुछ भी नहीं।
जो रहे—स्वागत,
जो जाए—आशीर्वाद।
अब दिल में भीड़ नहीं,
सिर्फ शांति है।

और वह पहली बार
अपने लिए चाय बनाती है,
एक किताब खोलती है,
खिड़की पर बैठती है,
और पाती है—
जीवन कभी भी उसके विरुद्ध नहीं था…
सिर्फ वह खुद के पक्ष में
खड़ी नहीं होती थी।

आज वह खुद के पक्ष में है।

आज वह निर्भर नहीं,
पर अनुपस्थित भी नहीं।
उसे किसी की ज़रूरत नहीं,
पर वह सबके लिए रोशनी है।

क्योंकि स्त्री तब सबसे प्रखर होती है
जब वह किसी से कुछ नहीं चाहती—
और फिर भी प्रेम करती है।

अपेक्षाएँ जिस दिन शून्य हुईं,
स्त्री उसी दिन पूर्ण हुई।
उसने दुनिया नहीं जीती—
खुद को जीत लिया।

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