कभी मैं प्रेम को बस एक कहानी समझती थी —
पन्नों पर खिलता हुआ गुलाब,
दो किरदारों की मुलाक़ात,
और अंत में एक सुंदर-सी याद।
मुझे लगता था —
प्रेम सिर्फ सुना जाता है…
उपन्यासों की नर्म घुमावदार लकीरों में,
कवियों के खोए हुए दर्द में,
गीतों की धीमी धुनों में।
पर तुमसे मिलकर जाना —
प्रेम किताबों के बाहर भी सांस लेता है।
वो नज़र के ठहर जाने में है,
शब्दों के रुक जाने में है,
और धड़कनों के अनायास बढ़ जाने में है।
तुमसे मिलकर जाना —
कहानियाँ सिर्फ पढ़ने से सुंदर नहीं होतीं,
उन्हें महसूस करना…
उन्हें जीना…
उन्हें अपनी आत्मा पर लिख देना —
सबसे अधिक सुंदर होता है।
क्योंकि प्रेम…
हाथ पकड़ लेने की क्रिया नहीं,
पकड़े रहने का विश्वास है।
प्रेम वह नहीं जो मिलता है,
प्रेम वह है जो छूटकर भी नहीं छूटता।
प्रेम वह नहीं जो बोला जाए,
प्रेम वह है जो
बिना आवाज़ के
सीने में पूरा संगीत बजा दे।
तुमसे मिलकर जाना —
कि प्रेम अंत नहीं ढूँढता,
वह कहानी नहीं पूछता,
वह नाम और मंज़िल से आगे होता है —
सिर्फ महसूस होने के लिए जन्मा हुआ।
और आज…
जब कोई कहता है
कि सबसे खूबसूरत प्रेम कहानियाँ
किताबों में होती हैं —
तो मैं मुस्कुराकर कहती हूँ,
नहीं… सबसे खूबसूरत कहानी
वह है जो मैंने तुम्हारे साथ लिखी है,
किसी काग़ज़ पर नहीं —
अपनी आत्मा पर।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें