मैंने खुद को किसी के हिस्से की कहानी समझा,
किसी के प्यार की जरूरत,
किसी की पसंद, नापसंद,
किसी की जीत, किसी की हार में बंधा समझा।
पर एक दिन आईना
थोड़ा गुस्से में बोला—
“तेरे अंदर कोई प्यासा पात्र नहीं,
तेरे अंदर एक ताज है,
तू किसी की भीख नहीं…
अपनी खुद की सत्ता है।”
उस दिन एहसास हुआ—
मैं गिरी नहीं थी,
मैं सोई थी।
और नींद से जागकर
मेरी रूह ने पहला आदेश दिया—
अब कोई मुझे चुनकर नहीं पाएगा,
अब मैं खुद को चुनकर रहूँगी।
मेरे अंदर की रानी
किसी महल की कैद नहीं,
वो तूफ़ान की बेटी है—
वो तब और चमकती है जब सब छोड़ जाएँ,
और तब सबसे ऊँची चलती है
जब हालात घुटनों पर आजाएँ।
वो चोटों से नहीं घबराती,
उन पर युद्ध की मुहर बना लेती है।
वो आँसुओं को कमजोरी नहीं कहती—
बल्कि कसम खाते हुए हथियार की तरह संभाल लेती है।
मेरे अंदर की रानी
प्यार करती है—
मगर खुद को खोकर नहीं
खुद पर और मजबूत बनकर।
वो रिश्ते निभाती है—
मगर खुद की कीमत देकर नहीं,
कीमत याद दिलाकर।
अब किसी को मेरी रूह पर हक़ नहीं,
अब मेरे सपने किसी की छाया पर नहीं टंगे।
अब मेरी खामोशी भी इज़्ज़त है,
और मेरा इंकार भी ताज की तरह भारी।
किसी को जाने से डर नहीं,
क्योंकि मेरे दिल की सल्तनत
किसी एक के रह जाने से नहीं चलती—
ये मेरे वजूद की चौखट पर चलती है।
अब मैं प्यार भी करूंगी
तो सर झुकाकर नहीं—
सर उठाकर।
क्योंकि मेरे अंदर की रानी
कभी किसी की मुकाम नहीं बनती,
वो खुद मंज़िल होती है।
उस दिन मैं सच में जी उठी—
जब मैंने महसूस किया
कि मेरे किस्मत का सिंहासन
किसी और के आने से नहीं,
मेरे खड़े होने से सजता है।
और अब?
अब जिसने भी मेरे अंदर की रानी को पहचान लिया—
उसकी दुनिया बदल जाएगी,
और जिसने नहीं पहचाना…
उसे मेरी दुनिया में जगह नहीं मिल पाएगी।
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