मैं तो काँच नहीं, मैं पर्वत हूँ
थोड़ा थक जाती हूँ पर खत्म नहीं होती…
मैं क्यों बिखर जाऊँ?
मैं तो तूफ़ानों की बेटी हूँ,
जितना ज़ोर से हवाएँ धक्का देती हैं
उतना ही मज़बूत जड़ें भीतर उग जाती हैं।
मैं कमजोर नहीं,
बस कभी-कभी दिल की आवाज़ तेज़ हो जाती है
तो लोग उसे आँसू समझ लेते हैं।
पर जो गिरता है, वही उठकर इतिहास बनाता है
और मैं गिरकर उठने की ठान चुकी हूँ।
मेरे हिस्से की रातें लंबी थीं,
ज़ख्म भी गहरे थे,
मगर सूरज की खोज मैंने बंद नहीं की…
हर हार के बाद दर्पण में खुद को देखकर
मैंने यही कहा —
“तू टूटी नहीं है… तू बदल रही है।”
दुनिया ने कहा —
छोड़ दो, थक जाओगी
मैंने कहा —
थककर रुक जाने से बेहतर है थककर जीत जाना।
कई लोग आए, बोले सहारा बनेंगे
लेकिन मैं गिरने से पहले ही संभल गई
क्योंकि मुझे समझ आ गया —
सहारा कभी बाहर नहीं,
हमेशा भीतर जन्म लेता है।
मैं आज भी मुस्कुराती हूँ
घाव छुपाने के लिए नहीं
बल्कि ये बताने के लिए
कि दर्द मुझे रोक नहीं सकता।
मेरी रूह हारना नहीं जानती,
मेरी नसों में करुणा नहीं, जिद बहती है—
जिद खुद को साबित करने की
जिद बिना शोर के चमकने की
जिद अपने अस्तित्व का आकाश देखने की।
मैं क्यों बिखर जाऊँ?
मेरा मन कच्चा हो सकता है
पर मैं मिट्टी नहीं, बीज हूँ —
कटूँगी नहीं…
तो भी एक दिन हरी हो जाऊँगी।
मैं तिनका नहीं, तूफ़ानों के बीच खड़ा पेड़ हूँ
डरती हूँ तो जड़ें पकड़ लेती हूँ
लड़ती हूँ तो शाखें उगाती हूँ
और जब जीतती हूँ
तो फूल बनकर पूरी दुनिया को खुशबू दे आती हूँ।
हाँ, मेरे भीतर आँधियाँ भी हैं
लेकिन उनसे बड़ा साहस भी है।
मैं क्यों बिखर जाऊँ?
मैं कमजोर नहीं…
मैं बस अभी अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में ढल रही हूँ।
और समय गवाह बनेगा —
जिस दिन मैं चमकी,
छुपाने के लिए रात भी काफी नहीं होगी। ✨
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें