शनिवार, 6 दिसंबर 2025

मै हूं ना

बड़ी आसान होती ज़िन्दगी,
अगर किसी एक क्षण तुम रुककर कहते —
"कोई बात नहीं… मैं हूँ न"
पर शायद हम जीवन की किताब को
बहुत सतही अक्षरों में पढ़ते रहे,
और अर्थ भीतर सोए रहे,
जैसे आत्मा की भाषा हम भूलते गए।

राह मुश्किल इसलिए नहीं थी
कि रास्ते में पत्थर थे,
राह मुश्किल इसलिए थी
क्योंकि हम गिरने को अपमान समझते रहे
सहारे को दुर्बलता,
और साथ को मोह का बंधन।

तुम कह देते —
"कोई बात नहीं… मैं हूँ न"
तो शायद समझ आता
कि मनुष्य अकेला नहीं जन्मा,
तो अकेला चलने के लिए बना भी नहीं।

दर्द भी कम होता,
क्योंकि दर्द तब तक जलता है
जब तक कोई उसे वैधता नहीं देता;
और सहारा वही वैधता है —
जो यह स्वीकार दिलाए
कि टूटना भी जीवन की भाषा है।

हम भूल गए कि भरोसा
भाग्य से बड़ा धर्म है,
और साथ
शरीर से नहीं —
आत्मा से निभाया जाता है।
कितना अलौकिक होता न,
अगर तुम एक पल को कहते —

“डर मत, अर्थ अभी खतम नहीं हुआ… मैं हूँ न।”

तब अस्तित्व का भार
दो हिस्सों में बंट जाता,
और आत्मा मन से कह पाती —
नाश से बचना जीवन नहीं,
नाश के बाद भी खिलना ही जीवन है।

शायद यही सृष्टि का रहस्य भी है —
हर आत्मा किसी दूसरी आत्मा को
एक अनकहा सहारा बनकर तलाशती है।
और ब्रह्मांड उतना विशाल नहीं
जितना मनुष्य की तन्हाई है।

आज सोचती हूँ —
तुम यह चार शब्द कह देते
तो किस्मत वैसी ही रहती,
घाव भी शायद वही रहते,
पर अस्तित्व बदल जाता।
क्योंकि मनुष्य संकटों से नहीं हारता,
अकेलेपन से हारता है।

कभी, किसी जन्म में,
किसी और नियति के पन्ने पर
यदि तुम मिलने लिखे गए,
तो मैं किसी चमत्कार की आशा नहीं करूंगी —
बस इतना चाहूंगी कि तुम फिर से मुस्कुराकर कहो —

“जिन्दगी कठिन हो तो क्या,
अर्थ अभी शेष है…
तुम चलो — मैं हूँ न।”

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