मै बेटी बनी —
कंगन सी खनकती जिम्मेदारियों में बँधी,
लाड़ की मूरत, पर बोलने की आज़ादी हमेशा बंद थी।
फिर पत्नी बनी —
सुहाग की लाल चुनरी में सपनों को तह कर दिया,
ख़ुशियों की दहेज में अपनी पहचान खुद ही दे दिया।
फिर माँ बनी —
नन्हे हाथों की खुशबू में इतनी घुल गई,
कि अपने आँसुओं की आवाज़ तक सुनाई न दी।
रिश्तों के हर मोड़ पर
मैंने अपना संसार सजाया,
पर एक सवाल हर जन्म में
मुझे खुद से टकराया —
मै बेटी बनी, पत्नी बनी, मां बनी…
पर मैं खुद कहाँ हूँ?
मेरे नाम की जगह "किसी की" जुड़ता रहा,
मेरे जीवन की कहानी में
मेरा अध्याय सबसे छोटा लिखा जाता रहा।
मेरे अस्तित्व को प्यार मिला —
पर स्वीकार नहीं,
मेरा वजूद देखा गया —
पर समझा नहीं।
सभी ने कहा —
“तुम हमारे लिए हो।”
पर कभी किसी ने नहीं पूछा —
“तुम अपने लिए क्या हो?”
मैंने हर रिश्ते में ख़ुद को दिया,
पर ख़ुद को कभी जी न सकी,
मेरी सांसें भी दूसरों की ख़्वाहिशों पर चलती थीं,
जिस्म़ मेरा था, पर ज़िंदगी मेरी कभी न रही।
आज इतना ही नहीं जानना —
कि मैं किसकी हूँ,
मैं यह जानना चाहती हूँ —
कि आखिर मैं मैं कहाँ हूँ?
अब मैं तलाश में हूँ
किसी नए नाम की नहीं —
अपने असली स्वरूप की।
अब मुझे रिश्ता नहीं —
खुद से मिलना है,
दुनिया को नहीं —
अपनी आत्मा को ज़िंदगी देना है।
अब मैं फिर जन्म लूंगी,
पर किसी की पहचान बनकर नहीं —
अपनी बनकर।
अब हर भूमिका के बीच
खोई हुई "मैं" लौटकर आएगी —
पूरी, स्वतंत्र, संपूर्ण।
क्योंकि
मैं सिर्फ बेटी, पत्नी, मां नहीं —
मैं भी एक पूरी “मैं” हूँ।
और इस बार…
मैं खुद को खोने नहीं दूँगी।
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