किसी फूल की तलाश में?
जहाँ पंखुड़ियों का जन्म
हवा की गोद में होता है,
जहाँ खुशबू बिना आवाज़ के
दिल तक उतर जाती है।
कभी चले हो
किसी नदी की खोज में?
जहाँ पानी सिर्फ बहता नहीं
बल्कि आत्मा को धो देता है,
जहाँ हर लहर में
अधूरेपन से मुक्ति का गीत छुपा होता है।
कभी चाहा है
ईश्वर को अपनी आँखों से देखना?
मूर्ति में नहीं,
विकल्पों की भीड़ में नहीं,
बल्कि अपने भीतर के शोर में
एक शांत बिंदु ढूँढकर?
लोग कहते हैं
सफर सड़कें तय करने से बनते हैं,
मगर सच तो यह है—
सबसे लंबी, सबसे कठिन,
सबसे सुंदर यात्राएँ
अंदर की ओर होती हैं।
किसी फूल की खोज में निकला हृदय
आख़िर में समझता है —
वो फूल बाहर नहीं,
उसके भीतर ही खिल रहा था।
किसी नदी की तलाश में भटका मन
एक दिन पाता है —
उसकी आत्मा ही जल है,
और वही उसकी प्यास बुझाने को पर्याप्त है।
ईश्वर की खोज करने वाली आँखें
अंततः देखती हैं —
ईश्वर कहीं दूर नहीं,
अहंकार के छूटते ही
मुस्कुराते हुए भीतर बैठा मिलता है।
यात्राएँ कई शुरू होती हैं
पैरों से,
पर पूरी होती हैं
हृदय से।
रास्ते अक्सर पेड़ों, पहाड़ों, शहरों से गुजरते हैं,
पर मंज़िल हमेशा
अपने-आप से मिलकर समाप्त होती है।
खोजो—
फूल, नदी, ईश्वर या अर्थ;
बस इतना याद रखना
कि हर खोज के अंत में
तुम्हें “तुम” ही मिलोगे।
और वही दिन
यात्रा का अंत नहीं,
अस्तित्व की शुरुआत होता है।
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