मानो सदियों से जमा ख्वाहिशों का सैलाब बह रहा हो—
हर बूंद जैसे एक ऐसा सपना हो
जो पूरे होने से पहले ही टूटना सीख गया।
कहते हैं समंदर में शोर बहुत होता है,
पर सबसे बड़ा शोर तो वहाँ जन्म लेता है
जहाँ ज़ुबान खामोश और दिल जाग रहा होता है—
जहाँ भीड़ में भी इंसान अकेला बैठा होता है
और खुद के भीतर खुद को तलाश रहा होता है।
अजीब है…
जीवन हमें चाहने का हुनर तो देता है,
पर पाने की गारंटी नहीं देता।
ये संसार दुआओं पर नहीं,
कर्मों पर नहीं,
बल्कि धैर्य पर टिका है—
जो धीरज रख ले, वही पार पाता है,
और जो टूट जाए, वही राह में छूट जाता है।
कुछ ख्वाहिशें ऐसी होती हैं—
जिन्हें पूरा होना नहीं,
बस किसी दिन दिल से निकल जाना होता है,
तभी आत्मा थोड़ी हल्की होती है।
कभी हम रिश्तों के पीछे भागते हैं,
कभी मंज़िलों के,
कभी किसी अपने के,
और आख़िर में पता चलता है—
सबसे कठिन यात्रा
किसी को पाना नहीं,
खुद को लौटा पाना है।
ये आँसू हार नहीं हैं,
इनमें बाढ़ नहीं, उपचार है—
ये धरती को गीला नहीं,
अहंकार को गीला करते हैं।
ये गिरते हैं ताकि इंसान
ज़िंदा रह सके, सुलगकर खत्म न हो जाए।
कभी-कभी टूटना भी ज़रूरी होता है,
क्योंकि साबुत रहने की जिद
मन को थका देती है।
थोड़ा बिखरना जरूरी है,
ताकि वक्त फिर से जोड़े तो
इंसान पहले से बेहतर बने।
और सच तो ये है—
हर अधूरा सपना एक शिक्षक है,
हर चुभन एक दिशा है,
हर विदाई एक रूपांतरण है।
कुछ लोग देने के लिए आते हैं,
कुछ छीनने के लिए,
कुछ सिर्फ़ सिखाने के लिए—
और हर किसी का मकसद पूरा होते ही
वो कहानी से निकल जाते हैं।
एक दिन समझ में आ जाता है—
कि कोई किसी का नहीं छूटता,
कोई भुलाया नहीं जाता,
बस आत्मा बड़ी हो जाती है,
और दुख छोटे।
आख़िर में यात्रा बाहर नहीं,
भीतर तय होती है।
मन जिस दिन थककर रुकना छोड़ देता है,
उसी दिन आत्मा चलना शुरू कर देती है।
अब खामोशियों में डर नहीं लगता,
अब अकेलापन खालीपन नहीं—
एक साधना है।
अब आँसू कमजोरी नहीं,
एक पवित्र शुद्धि है।
अब ख्वाहिशें बोझ नहीं,
अनुभव हैं।
और सबसे सुंदर क्षण तब आता है—
जब इंसान मुस्कुराते हुए कह पाता है:
“मुझे अब कुछ पाना नहीं,
मुझे सिर्फ़ रहना है…
अपने भीतर, अपने सत्य के साथ।”
यही वो पल होता है
जब आत्मा अपने सबसे ऊँचे शिखर पर पहुँचती है—
बिना शोर,
बिना विजय के,
बिना किसी नाम के…
सिर्फ़ एक पूर्ण शांति बनकर।
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