और साल जा रहा है,
वक़्त अपनी चुप्पी समेटे
धीरे-धीरे दरवाज़ा बंद कर रहा है।
कैलेंडर के पन्ने नहीं पलट रहे,
यादों के अध्याय बदल रहे हैं—
कहीं हँसी की स्याही सूखी है,
कहीं आँसुओं की लकीरें आज भी गीली हैं।
यह साल भी आया था
बहुत-से वादों के साथ,
कुछ पूरे हुए,
कुछ आधे रास्ते पर थककर बैठ गए।
किसी ने हमें छोड़ा,
किसी ने हमें पाया,
और किसी ने हमारे भीतर
एक नई समझ छोड़ दी।
कुछ सपने टूटे,
पर टूटकर भी सिखा गए
कि हर गिरना हार नहीं होता,
कभी-कभी ज़मीन पहचानने का नाम होता है।
कुछ रिश्ते चुप हो गए,
शब्द कम और ख़ामोशियाँ ज़्यादा हो गईं,
पर उन्हीं खामोशियों ने बताया
कि कौन अपना था और कौन सिर्फ़ साथ चल रहा था।
कुछ लम्हे बाकी हैं…
इनमें पछतावे भी हैं,
और माफ़ी की अधूरी कोशिशें भी।
काश, वक़्त से पहले
दिल हल्का कर लिया होता।
साल जा रहा है,
पर सवाल छोड़ गया है—
क्या हम थोड़े और सच्चे हो पाए?
क्या हमने खुद से दोस्ती निभाई?
इस जाते हुए साल से
कोई शिकायत नहीं,
यह जो था, जैसा था,
यही हमें आज का हम बना गया।
अब नए साल से
बहुत बड़े वादे नहीं करने,
बस इतना चाहना है—
जो मिले, उसे पूरी शिद्दत से जिया जाए,
जो जाए, उसे सम्मान से विदा किया जाए।
कुछ लम्हे बाकी हैं,
इन्हें यूँ ही मत जाने देना—
एक गहरी साँस लो,
दिल से शुक्रिया कहो,
और मुस्कुराकर कहो—
जा रहे साल,
तूने हमें मजबूत बनाया…
#अलविदा 2025
अब बारी हमारी है।
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