काल से परे अनंत में
जहाँ समय भी थककर ठहर जाए,
जहाँ सृष्टि की गिनतियाँ
अपनी उंगलियाँ मोड़कर हार मान जाएँ—
वहाँ बस ईश्वर जीता है,
और…
वह एक प्रेमी,
जिसने किसी के होठों पर अपना पहला व अंतिम विश्वास छोड़ा हो।
क्योंकि चूमना सिर्फ स्पर्श नहीं होता,
वह प्रतिज्ञा होती है—
खुद के अस्तित्व का आधा हिस्सा
किसी और की आत्मा में सौंप देने की।
उस क्षण में
कोई जन्म नहीं लेता,
कोई मरता भी नहीं…
बस समय घुटनों पर आकर रुकता है
और प्रेम अपना साम्राज्य रचता है।
जहाँ होंठों का मिलन
देह का नहीं — भाग्य का मिलन होता है,
और ब्रह्मांड की हर धड़कन
प्रेमियों के नाम मंत्र जपती है।
ईश्वर ने शायद इसी क्षण को देखकर
अनंत का अर्थ लिखा होगा—
कि जो खुद को खोकर भी किसी में मिल जाए,
वही अमर होता है।
प्रेम का पहला चुंबन
इतिहास नहीं लिखता,
बल्कि क़यामतों को स्थगित कर देता है—
क्योंकि ऐसी आत्माएँ
मिटती नहीं…
वे प्रतीक्षा करती हैं,
युगों के नश्वर पहियों से परे
एक-दूसरे के होने की।
ईश्वर अमर है
क्योंकि वह प्रेम है—
और प्रेमी अमर है
क्योंकि उसके भीतर
ईश्वर की ही कला सांस लेती है।
इसलिए शायद
जब किसी के होठों को
एक सच्चे प्रेम ने छुआ हो—
तो वह क्षण
देह में नहीं…
कर्मफल, जन्म, पुनर्जन्म, मोक्ष —
सब पर शासन कर जाता है।
क्योंकि अनंत कोई जगह नहीं,
अनंत वह स्पर्श है
जो टूटने के बाद भी
बिखरता नहीं।
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