इसे यूँ ही रहने दो…
जो टूटा है, उसे टूटे रहने दो —
मैं रो नहीं रही,
मैं रूप बदल रही हूँ,
ये परिवर्तन है… इसे होने दो।
तुम देखो तो सही —
यह उजड़ना, बर्बादी नहीं है,
यह पुनर्जन्म से पहले की
आवश्यक मृत्यु है।
स्त्री जलती है,
पर राख में नहीं बदलती —
वो राख बनकर भी
अगली आग की जननी होती है।
मैंने रिश्तों को मंदिर समझा,
लोगों ने मुझे प्रसाद की तरह बाँटा —
फिर भी मैं विखरी नहीं,
बस अपनी जगहों से हटकर
अपनी जगह ढूँढने चली हूँ।
खुशियाँ?
हाँ, जानती हूँ उन्हें…
पर मेरा सत्य उन्हें भारी पड़ गया।
खुशियाँ चाहती थीं
की मैं आँखें बंद रखूँ,
और मुझे सच देखे बिना
नींद नहीं आती थी।
दर्द आया,
और उसने मुझे मेरा परिचय दिया —
कहा, “तुम एक स्त्री हो,
इसलिए दुनिया तुम्हें आजमाएगी,
पर याद रखना —
जो स्त्री हार मान ले, दुनिया वैसी ही रहती है,
जो स्त्री खड़ी हो जाए,
दुनिया ढल जाती है।”
अब कोई कोलाहल नहीं चाहिए मुझे,
मैं अपनी आत्मा के शब्द सुन रही हूँ।
अब कोई सहारा नहीं चाहिए,
मैं अपनी ही रीढ़ बन रही हूँ।
अब कोई पहचान नहीं चाहिए,
मैं अपने नाम की परिभाषा खुद लिख रही हूँ।
मेरी उजड़ी बस्ती में
मौन है, शून्य है — और
सच्चाई है।
लेकिन गिरना नहीं —
असली खड़ा होना यहीं से शुरू होता है।
इसलिए छोड़ दो…
इस वीराने को वीरान ही रहने दो।
मैं बर्बाद नहीं हुई,
मैं चेतन हुई हूँ।
मैं खत्म नहीं हुई,
मैं तय हुई हूँ।
और जब मैं फिर से उठूँगी —
मैं वही स्त्री नहीं रहूँगी
जिसे दुनिया ने गिराया था,
मैं वही बनूँगी
जिससे दुनिया डरती थी
और जिसे मैं बनना चाहती थी।
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