तस्वीरों के रंगों से लोगों की क़ीमत मत आँकना…
चेहरों की मुस्कानें बहुत बार… दर्द की रखवाली होती हैं।
ज़िंदगी की किताब…
नज़रों से नहीं…
तजुर्बों से पढ़ी जाती है।
क़रीब आओ…
तो ही रूह की गिरह खुलती है,
वरना दूरियों में
हर शक़्स फ़रिश्ता लगता है।
आज कोई शहद सा लगे…
कल वही जला भी सकता है,
क्योंकि हर मीठी बोली में
वफ़ा की खुशबू नहीं होती।
लोग दर्पण नहीं — समंदर हैं…
उतरना पड़ता है,
किनारों पर खड़े होकर
कोई किसी को नहीं समझता।
मिश्री भी ज़हर बन जाती है
अगर नियत में खोट हो,
और फ़िटकरी भी मरहम बन जाती है
अगर जज़्बात सच्चे हों।
चेहरों की रौनक से फ़ैसला मत कीजिए…
दिल की सूरत का सफ़र निभाइए…
कौन दवा है…
कौन ज़हर है…
ये तस्वीरें नहीं बताएँगी…
क़रीब आओ…
जलो…
और तजुर्बा करके देखो।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें