सोमवार, 8 दिसंबर 2025

आज मै आज होना चाहती हु

आज मैं सिर्फ़ “मैं” होना चाहती हूँ
किसी की अपेक्षाओं में ढली हुई परछाई नहीं,
किसी नाम, रिश्ते, या फ़र्ज़ में बंधी पहचान नहीं —
बस… मैं।

मैं आज अपनी ही सांसों की धुन बनना चाहती हूँ,
जहाँ दिल की हर धड़कन
मेरी इच्छा से जन्म ले,
न कि किसी स्वीकृति की प्रतीक्षा में।

मैं शब्द बनकर नहीं,
मतलब बनकर जीना चाहती हूँ,
ऐसे वाक्यों में नहीं बंधना
जहाँ विराम भी नियमों से तय हों।
मैं बहना चाहती हूँ…
नदी की तरह —
जहाँ मोड़ भी मेरी मर्ज़ी के हों
और किनारे भी मेरे अपने।

मैं आज खुली किताब होना चाहती हूँ,
पर किसी के पढ़ने के लिए नहीं।
अपने लिए,
अपने पन्नों को स्वयं पलटते हुए,
उन अनलिखे अध्यायों को साहस से भरते हुए
जहाँ “ना” कहना भी उतना ही सुन्दर लगे
जितना “हाँ” सुनाई देता था।

मैं शांत होना चाहती हूँ…
रेगिस्तान की अनंत विस्तृत शांति जैसी —
जहाँ शोर के बिना भी अस्तित्व की गूंज हो,
जहाँ लोग खो नहीं जाते,
बल्कि खुद को पा लेते हैं।

मैं आवाज़ होना चाहती हूँ —
बिना बंदिशों, बिना विरामचिह्नों के,
जहाँ हर सुर में आज़ादी हो,
हर लहजे में जीवन
और हर शब्द में मैं।

मैं रात के गहरे आकाश में
एक तारा नहीं,
पूरा नक्षत्र बनकर चमकना चाहती हूँ,
ताकि खोजने वाले को राह मिले,
पर पकड़ने वाले की हथेली जल जाए —
क्योंकि प्रकाश कभी मालिकाना नहीं होता।

मैं आज “मैं” होना चाहती हूँ —
न किसी की बनकर,
न किसी के लिए बनकर,
बस बनने की प्रक्रिया का उत्सव बनी हुई।

अगर दुनिया चाहे तो मुझे समझने में सदियाँ लगा ले,
पर मुझे खुद को समझने में
बस यह एक दिन काफी है —
क्योंकि आज…
मैं अपने लिए जन्म ले रही हूँ।

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