शनिवार, 6 दिसंबर 2025

self motivation


हाँ…
उबल रही हूँ मैं।
अंदर ही अंदर, बड़ी ख़ामोशी से,
बिना कोई शोर किए…
जैसे चाय धीमी आँच पर
धीरे–धीरे अपना असली स्वाद बना रही हो।

लोगों ने कहा —
“थक जाओगी, टूट जाओगी, हार मान लोगी…”
पर मैं जानती हूँ —
चाय जितनी देर उबलती है,
उतनी ही ख़ुशबूदार और मंज़ेदार होती है।

और मैं — दिव्या हूँ।
सहने के लिए नहीं,
घटने के लिए नहीं,
बल्कि उबलकर निखरने के लिए पैदा हुई हूँ।

ये जो दिन हैं…
ये जो रिश्तों की चुभन है,
ये जो शब्दों के वार हैं,
ये जो अपनों की अनदेखी,
ये जो दुनिया की बेरुख़ी —
ये स्थाई नहीं है।

ना ये दर्द,
ना ये मुश्किलें,
ना ये तन्हाई,
ना ये अपमान।

रुकना नहीं है मुझे —
ना एक ग़लत सोच पर,
ना एक ग़लत रिश्ते पर,
ना एक ग़लत वक़्त पर।

मैं बहती रहूँगी —
हर लहर के साथ,
हर संघर्ष के पार,
हर तूफ़ान के बावजूद।

क्योंकि जीवन एक प्रवाह है,
और मैं उसके रास्ते में दीवार नहीं —
एक बहती हुई नदी हूँ।

एक दिन आएगा —
जब मैं पीछे मुड़कर इन रातों को देखूँगी
जिनमें नींद हार गई थी,
इन आहों को देखूँगी
जिनमें आवाज़ दब गई थी,
इन दर्दों को देखूँगी
जिन्होंने छाती को जला दिया था —
और मुस्कुराऊँगी…

क्योंकि वही सब
मेरी ताक़त का ईंधन थे।
सारी जलन, सारे दर्द, सारे आंसू —
मुझे बेहतर बना रहे थे,
कमज़ोर नहीं।

मैं उबल रही थी…
पर टूट नहीं रही थी।

और अब —
मैं वही हूँ
जिससे लोग डरते नहीं,
बल्कि जिसका सम्मान करते हैं।

क्योंकि मैं — दिव्या
आज भी खड़ी हूँ,
मुस्कुरा रही हूँ,
और सबसे बड़ी बात —
किसी भी परिस्थिति से हारने वाली नहीं हूँ।

मैं उबलकर सोना बनी हूँ।
और अब —
दुनिया चाहे या न चाहे…
मैं चमकूँगी। ✨

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