जहाँ तक तुमने देखा,
उसी निगाह की सीमा तक ज़िंदा हूँ मैं,
तुम्हारी याद के आख़िरी मोड़ पर
अधूरी साँस सी बंद पड़ी दोपहर हूँ मैं।
तुम्हारे होने की सरहद से आगे
मैं बदन नहीं—एक अहसास हूँ,
ओस में भीगी ख़ामोशी की
धीमी‑सी रौशनी वाली प्यास हूँ मैं।
तुम्हारी हथेली पर लिखी थी
मगर नाम बनने की इजाज़त न मिली,
रिश्तों की अदालत में
क़िस्मत की गवाही भी क़ुबूल न हुई—
इसलिए आज भी
कहानी नहीं, सफ़हों के बीच अटका अल्फ़ाज़ हूँ मैं।
तुम जीत गए दुनिया को,
मैं हार गई सिर्फ़ ख़ुद को,
और इस हार की राख में
धीमे‑धीमे तुमको ही जलाती आग हूँ मैं।
कभी धुएँ की तरह उड़ जाती हूँ
तुम्हारे हर ग़ुरूर की छत पर,
कभी ख़्वाब बनकर लौट आती हूँ
तुम्हारी रातों के बेज़ुबान डर पर।
तुमने मुझे देखा जितना—
वहीं तक सीमित रह गई मेरी ज़िंदगी,
जो तुमने समझा ही नहीं
वो पूरा ब्रह्मांडगी हूँ मैं।
तुम्हारी आँखों में जितनी जगह मिली—
बस उतना ही वजूद है मेरा,
बाक़ी सब…
अनकही पुकारें हैं, अनसुने वादे हैं,
अधूरी मोहब्बत के घेरों में
आधी जली दुनिया का नक़्शा हूँ मैं।
तुमने मुझे पाया ही नहीं
वरना जान जाते—
मैं कोई ख़्वाब नहीं
जो बिखरकर मिट जाए,
मैं वो धुआँ हूँ
जो जलने की वजह भी लिख जाता है
और जलाने का इतिहास भी।
तुम जितना याद रखो
उतनी ही मरती-जिंदा रहती हूँ,
तुम जितना भूल जाओ—
उतना और फैलती हुई
अलविदा बनकर तुम्हें काटती हूँ।
हाँ…
जहाँ तक तुमने देखा — वही तक जिंदा हूँ मैं,
पर जहाँ तुमने देखा ही नहीं,
वहाँ मैं तूफ़ान हूँ, साज़िश हूँ,
तुम्हारे दिल की बरसों बंद तिजोरी में
आख़िरी सच की आवाज़ हूँ मैं।
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