सोमवार, 1 दिसंबर 2025

जिंदगी ही तो है कट जाएगी

जहाँ शब्दों की मिट्टी गीली हो जाती है,
जहाँ उम्मीद की आख़िरी चिंगारी भी राख में सो जाती है,
जहाँ दिल हार मानने और टूट जाने की दहलीज़ पर खड़ा होता है—
वहीं एक धीमी आवाज़, बिना आवाज़ के कह जाती है…
“जिंदगी ही तो है… कट जाएगी।”

जितनी बार साँसें बोझ लगती हैं,
आँसू नमक नहीं — इम्तिहान लगते हैं,
और जो लोग अपने नहीं थे,
वही जरूरी बनकर दिल में घर कर जाते हैं—
तब मन फिर वही समझाता है…
“जिंदगी ही तो है… कट जाएगी।”

कभी वक़्त थप्पड़ बनकर गिराता है,
कभी किस्मत आँधी बनकर रुलाती है,
कभी अपने ही पराये कहलाते हैं,
और कभी पराये दिल के सबसे अपने बन जाते हैं—
पर सफ़र रुकता नहीं, थमना आता नहीं,
ये वक़्त भी धीरे से फुसफुसाता है…
“जिंदगी ही तो है… कट जाएगी।”

तन्हाई के कंधे पर सिर रखकर
रातों ने कई बार दिल की धड़कनें सुनी हैं,
टूटकर भी मुस्कुराने की कला सीखी हमने,
और जीते जी हारकर भी जीतने का हुनर बुना है—
दरारों में भी रोशनी मिल जाती है,
अगर दिल थककर भी बोल दे…
“जिंदगी ही तो है… कट जाएगी।”

कल किसी को याद ही न रहेंगे हम,
और आज भी कौन याद से ज़्यादा संभालता है?
दुनिया उलझनों से भरी है,
पर हल खुद दिल के अंदर पलता है—
जिन्हें जाना था, वे चले ही जाते हैं,
जो रहना है, वही रूह में बस जाते हैं…
बाक़ी? बस सुकून से कह देना—
“जिंदगी ही तो है… कट जाएगी।”

किसी दिन ये दर्द भी मौसम की तरह बदल जाएगा,
गम की सर्दियों में खुशियों का सूरज फिर उग आएगा,
जिसे खोया है, उसकी कमी मिटेगी नहीं,
पर उसके बिना जीने की आदत ज़रूर हो जाएगी…

और जब रोशनी फिर लौटेगी,
तो आज का टूटा हुआ दिल गर्व से कहेगा—
“देखा… जिंदगी ही तो थी… कट गई।”

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