रिश्ते तो साहब अंदाज़ में जीये जाएँ,
जहाँ दिल साँसों की तरह आज़ाद चले,
और मोहब्बत, थपकियों की तरह धीमे से बिखर जाए।
रिश्ता सौदे में बदले, तो एहसास बेचैन होते हैं,
पलकों की नमी भी बोल उठती है —
“तुम मेरे हो पर काबिल-ए-कैद नहीं।”
प्यार, हुक्म से नहीं, विश्वास की बारिश में खिलता है।
जिस रिश्ते में हर बात के बदले एक बात हो,
जहाँ हर खुशी की कीमत एक मजबूरी हो —
वो रिश्ता नहीं,
दिलों पर डाला गया कोई करार होता है।
और करार हमेशा टूटते हैं,
पर रिश्ते… बस निभाए जाते हैं।
क़समों से ज्यादा खूबसूरत होता है एहसास,
दिखावे से ज्यादा पवित्र होता है एहतराम,
और हक़ जताने से ज्यादा गहरा होता है,
बिना शब्दों के दिया गया साथ।
रिश्तों को बन्धन दे दो, तो परिंदे डर जाते हैं,
उन्हें पंख दे दो — तो वही लौटकर कंधे पर आ बैठते हैं।
इश्क़ को कैद की औकात मत दो,
ये समंदर है, तालाब नहीं —
दूर जाए तो भी अपना होता है,
पास आए तो भी नाज़ुक नहीं।
चलो ऐसा रिश्ता रखें —
न शिकायतों के तख्त पर,
न अपेक्षाओं की अदालत में;
बस आँखों की भाषा,
सच्चाई की तर्ज़,
और प्रेम का सुकून।
जहाँ मिलने का कोई हिसाब न हो,
बिछड़ने का कोई डर न हो,
जहाँ हम एक-दूसरे के लिए हों,
मगर एक-दूसरे के स्वामित्व में नहीं।
क्योंकि रिश्ते, जितने बेफ़िक्र होते हैं,
उतने ही गहरे उतरते हैं।
जहाँ प्यार बेपरवाह हो —
वहाँ टूटना भी कम लगता है,
और जुड़ना… आसमान जैसा विशाल।
इसलिए…
मत पहनाओ इन्हें शर्तों का लिबास,
रिश्ते तो साहब बिंदास ही अच्छे लगते हैं —
जैसे खुले आसमान तले बैठकर
मौन में भी बातें होती रहें,
और बिना कुछ माँगे
सब कुछ मिल जाता रहे।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें