बुधवार, 3 दिसंबर 2025

मै एक सबक छोड़ जाऊंगी

जिस दिन मैं इस भीड़ से चुपचाप गुजर जाऊंगी,
लोग कहेंगे — “अजीब थी” फिर भूल भी जाएंगे,
पर मैं नाम नहीं,
एक सबक छोड़ जाऊंगी।

किसी को सिखा जाऊंगी कि
दिल टूटे तो आँसू नहीं,
खामोशी सबसे तीखा जवाब होती है।
किसी को बता जाऊंगी कि
मोहब्बत हो तो सर झुके नहीं,
इज़्ज़त हमेशा प्यार से बड़ी होती है।

मैं मुस्कुराहट के पीछे की आग बनकर
किसी के अंदर हिम्मत जगा जाऊंगी,
कि गिरकर भी जीना पड़ता है,
और रोकर भी जीतना पड़ता है।

किसी को एहसास दिला जाऊंगी कि
लोग बदलते हैं— वक़्त नहीं,
और खुद से बढ़कर
कोई ताज नहीं।

कल शायद मैं किसी कहानी में न दिखूँ,
न तस्वीरों में, न यादों में,
पर जो मेरे जैसा टूटते-टूटते भी खड़े होंगे—
उनकी रगों में
थोड़ी मैं धड़क जाऊंगी।

क्योंकि मेरा सफ़र चाहतों का नहीं,
चरित्र का था,
और चरित्र कभी मरता नहीं,
सिर्फ विरासत बन जाता है…

तो चाहे तालियाँ मिलें या ताने,
चाहे प्यार मिले या तिरस्कार—
मैं जाने से पहले इतना ज़रूर कर जाऊंगी,
कि दुनिया याद रखे —
एक औरत थी, जो हार नहीं मानती थी।

और बस,
नाम नहीं…
मैं एक सबक छोड़ जाऊंगी।

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