बुधवार, 3 दिसंबर 2025

मै टकराना चाहती हु तूफानों से



मैं टकराना चाहती हूँ तूफ़ानों से,
क्योंकि समंदर की शांति ने कभी
मुझे पहचानना नहीं सिखाया।

मैं डूबकर उठना चाहती हूँ,
क्योंकि किनारों की ज़मीन पर रहकर
किसी ने तकदीर नहीं बनाई।

मैं चीख़ बनकर नहीं,
सन्नाटे की धार बनकर लड़ूँगी—
जो दिखे भी नहीं… मगर तोड़ दे पहाड़ों को।

मैं डर के पंख नहीं पहनूँगी,
मैं जिद की तलवार बनाऊँगी,
और हवाओं से कह दूँगी —
“चल, जितना बल है आज़मा ले।”

तूफ़ान आए, तो आए,
मैं अपनी रगों का लहू गरम कर लूँगी,
अपनी इच्छाशक्ति को कवच पहनाऊँगी,
और गिरूँगी भी तो वहीं से उठूँगी
जहाँ गिरकर कई लोग रुक जाते हैं।

क्योंकि मैं फूल नहीं,
एक पर्वत की बेटी हूँ—
जिसे हिमपात भी रोक नहीं पाता।

मुझमें हारने की गुंजाइश नहीं,
क्योंकि मैं युद्ध नहीं,
अपना स्वयं का इतिहास लिखने निकली हूँ।

जो मुझे तोड़ना चाहते हैं,
याद रखें —
मैं राख नहीं, अग्नि हूँ,
हर हार के बाद और भयंकर जलती हूँ।

और एक दिन,
ये तूफ़ान भी थककर रुक जाएगा,
और दुनिया कहेगी —
“एक औरत थी… जिसने हवाओं को झुकना सीखा दिया।”

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