बुधवार, 3 दिसंबर 2025

रिश्तों के बंधन काट दिया तो पंख अपने आप लग गए

ऐसा तो नहीं था कि हम चल नहीं सकते,
रोकने वाला कोई अपना बनकर खड़ा था,
हाथ थामने के बहाने
पैरों में बेड़ियाँ बाँधने वाला निकला।

रास्ते खराब नहीं थे,
रिश्ते खराब थे।
जो पास थे… वही सबसे ज़्यादा दूरी के खिलाफ थे,
कंधे पर हाथ रखकर चलते थे,
लेकिन मन में चाहते थे — हम कभी उनसे आगे न निकलें।

हम हारते नहीं थे…
हमें हराया गया था प्यार के नाम पर।
मासूमियत को कमज़ोरी समझा गया,
विश्वास को खिलौना,
और हमारी तरक्की — दूसरों के अहंकार पर चोट बन गई।

कभी कहा गया —
“हम तुम्हारे साथ हैं”…
और पीछे से रास्ते काटे गए।
कभी कहा गया —
“हम तुम्हारा भला चाहते हैं”…
और सलाह के नाम पर पाँव खींचे गए।

रिश्ते ही सबसे बड़े पहाड़ थे,
अजनबी नहीं — अपने ही सबसे बड़े दुश्मन निकले।
दुनिया ने नहीं रोका,
अपनों ने रोका… क्योंकि हमारी उड़ान उन्हें चुभती थी।

लेकिन अब कहानी पलट गई है —
जो असली था, रह गया…
जो काम का नहीं था, हट गया।
अब न शिकायत है, न इंतज़ार, न मोह।

और अब जब हम अपनी मंज़िल की तरफ चलेंगे,
तो वही चेहरे घूमेंगे ताज्जुब से देख कर —
“इतना आगे कैसे पहुँच गए?”

हम बस इतना जवाब देंगे —
“ऐसा तो नहीं था कि हम चल नहीं सकते…
रिश्तों के बंधन काट दिए,
और पंख अपने आप उड़ गए।”

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें