और खुद किसी पेड़ की तरह
हर मौसम में हरा होने का दावा करे—
वो रिश्ता नहीं,
बस आपकी सहनशक्ति की परीक्षा है।
मैंने ऐसे लोगों को देखा है
जो कहते हैं, “मैं तुम्हारे साथ हूँ”
मगर साथ सिर्फ़ तब
जब रास्ता सीधा हो,
जब ज़मीन ठंडी हो
और पाँव जलने का डर न हो।
धूप में अकेले खड़े रहकर
आप खुद ही छाया ढूँढना सीख जाते हैं,
यही सबसे बड़ा धोखा है—
कि हम अपने जलने को
मजबूती समझ लेते हैं।
जो रिश्ता
आपकी प्यास को ही सबूत माने
कि आप कितने सच्चे हैं,
वो कभी पानी नहीं बनेगा—
चाहे आप रेगिस्तान बन जाएँ।
याद रखिए,
छांव वो नहीं जो
धूप में याद आए,
छांव वो होती है
जिसके नीचे खड़े होकर
आप सांस ले सकें…
बिना खुद को साबित किए।
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