कहने को सब राम-सी पवित्रता का दावा करते हैं,
और चेहरे पर मुस्कान ऐसे सजाते हैं
जैसे हर दिल में लक्ष्मण-सा स्नेह पलता हो।
पर भीतर…
अंधेरों की एक बस्ती है,
जहाँ संबंधों के शव,
हमदर्दी के नकली फूलों के नीचे दबे सड़ते रहते हैं।
यहाँ
भाईचारे की बातें सिर्फ दीवारों पर लिखी नीयतें हैं,
जो बारिश लगते ही बह जाती हैं,
और इंसान…
अपनी सुविधा की आग में
दूसरे का भरोसा जलता देखकर ही गर्मी पाता है।
कहने को सब कहते हैं—
“हम तो तुम्हारे साथ हैं”,
पर सच्चाई यह है कि
साथ वहीं तक होता है
जहाँ स्वार्थ की सीमा खत्म न हो।
कहते हैं—
“हम राम-लक्ष्मण जैसे हैं”,
पर भीतर
हिरण्यकश्यप की अहंकारी ठंडक है,
रावण-सी दस दिशाओं में फैलती चालाकियाँ हैं,
और मंथरा-सी फुसफुसाहटें,
जो रिश्ते तोड़ने में
एक पल भी नहीं लगातीं।
यह दुनिया
दिखावे के दीपक जलाती है,
पर घी की जगह
फरेब का तेल भरती है,
तभी उनकी लौ
इतना धुआँ देती है
कि असलियत दिखाई ही नहीं देती।
सच तो यह है—
रावण अब सोने की लंका में नहीं रहता,
वह रह रहा है
हमारी सभ्य बातचीतों में,
हमारे विनम्र चेहरों में,
हमारी मधुर आवाज़ों में,
वह रहता है वहाँ
जहाँ भरोसा सस्ता
और लाभ महँगा होता है।
राम जैसा होना
अब सिर्फ किताबों का गुण है,
लक्ष्मण का त्याग
अब सिर्फ दीवार पोस्टरों की नसीहत,
और सीता का धैर्य
अब सिर्फ परीक्षाओं की कहानी—
दुनिया ने इन सबको
अपनी सुविधानुसार
संक्षिप्त कर दिया है।
आज…
संबंधों की परीक्षा नहीं होती,
बल्कि
उपयोगिता की होती है।
जो काम आता है वही अच्छा,
जो काम न आए
वह भीड़ में अदृश्य हो जाता है।
दिखावे की दुनिया है—
जहाँ मिठास शब्दों में घोली जाती है
पर इरादे कड़वे रखे जाते हैं,
जहाँ भाई कहने वाले
पहले मौका देखते हैं,
फिर साथ देते हैं।
और मैं…
मैं इन नकली रोशनीओं के बीच
एक सच ढूँढ रही हूँ—
एक ऐसा रिश्ता
जो मुखौटा नहीं पहनता हो,
एक इंसान
जो बोलते समय
स्वार्थ के तराजू न तोलता हो।
शायद कोई राम नहीं मिलेगा,
शायद लक्ष्मण का साया भी मुश्किल है,
पर उम्मीद यह है कि
कहीं तो कोई ऐसा होगा
जिसकी आँखों में रावण न बसता हो।
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