बुधवार, 10 दिसंबर 2025

शहर ए नुमाइश में

लफ़्ज़ों में ही लिख दो अपनेपन की सारी दास्तान,
यहाँ दिल के सौदागर नहीं, बस चकाचौंध के दुकानदार हैं।

यह शहर बड़ा अजीब है…
चेहरों पर मुस्कान उधार की,
और रिश्तों पर कीमतें तय हैं—
जो जितना चमके, उतना क़ीमती ठहरे।

मैंने भी कभी ढूँढे थे अहसास के जौहरी,
जो धड़कनों को तौल कर नहीं,
महसूस कर के जवाब देते है…
पर यहाँ तो हर हाथ में तराज़ू है,
हर बातचीत में हिसाब है।

क़दम-क़दम पर रिश्ते बिकते हैं,
और खरीदार भी वही—
जो खुद बिक चुके हों किसी और चमक में।

इसलिए…
तुम बस लफ़्ज़ों में ही कहना ‘अपना’,
तुम्हारी आवाज़ में सच्चाई हो तो काफी है,
क्योंकि दिल यहाँ प्रदर्शनी का सामान नहीं,
और मैं नीलामियों में नहीं जाती।

मैं चाहती हूँ—
कोई ऐसा मिले जो मेरे टूटे हुए अक्षरों में भी
पूरी कविता पढ़ ले,
जो मेरे ख़ामोश वक़्त में भी
मेरे होने की आहट सुन ले।

अगर ऐसा कोई न मिले,
तो बेहतर है…
मैं अपने सच को अपनी हथेलियों में हिफ़ाज़त से सँभालूँ,
क्योंकि इस शहर-ए-नुमाइश में
अहसासों की परख करने वाले लोग
अब पैदा नहीं होते।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें