मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

उम्मीदों की मौत

उम्मीदें दिलाकर कोई दिल तोड़ गया —
ये कोई किस्सा नहीं,
ये किसी मासूम रूह की हत्या है।

वो गया तो दरवाज़ा नहीं टूटा,
अंदर का वजूद टूट गया।
मेरी हँसी सलाखों के पीछे कैद है
और आज़ाद वही है
जिसने वादा करके मुकरना सीख लिया।

वो कहता था —
“तुम मेरी हो”
और मैंने आँखें बंद करके मान भी लिया,
क्योंकि प्रेम में सबसे पहले
दिमाग मरता है
और दिल राज करता है।

लेकिन अब समझ में आया —
कि किसी पर भरोसा करना
अपने गले में रस्सी डालकर
उसे चाबी सौंपने जैसा है।

किसी ने उम्मीदें दिलाईं,
और दिल तोड़ गया —
मगर सच तो ये है
कि किसी ने दिल नहीं तोड़ा,
मैंने खुद को उसकी बातों में खो दिया।
उसके जाने की आवाज़ धीमी थी,
पर मेरे टूटने की आवाज़
मेरी रूह ने सुनी।

मैं आज भी ज़िंदा हूँ…
पर पहले जैसी नहीं।
अब मुस्कान में सावधानी है,
प्यार में दूरी है,
और भरोसे के दरवाज़े पर
ताला भी है —
चाबी भी मेरे पास नहीं।

जिस दिन जाना
कि इंसान वादों से नहीं,
इरादों से पहचाना जाता है,
उस दिन मैंने
किसी के “साथ निभाने” पर यकीन करना छोड़ दिया।

वो याद नहीं आता —
लेकिन उसने सिखा दिया
कि दिल कभी मूर्खताओं में नहीं,
दूरियों में सुरक्षित रहता है।

अब कोई आये तो मुझे पकड़कर नहीं,
मुझे समझकर रहे,
क्योंकि मैं वो लड़की नहीं
जो टुकड़ों में मिलने वाली मोहब्बत से खुश हो जाए।
मैं पूरी की पूरी चाहिए…
या बिल्कुल नहीं।

और हाँ —
जिसने उम्मीदें दिलाकर दिल तोड़ा था,
उससे कहना —
मैं अब टूटी नहीं,
कड़े हो चुकी हूँ।
अब मेरा दिल मोम नहीं —
फौलाद है,
और बिना सच्चाई के किसी को
उस तक पहुँचने की इजाज़त नहीं मिलती।

आज दर्पण में खुद को देखती हूँ
और मन में एक ही वाक्य बजता है —

“जिसे खोकर तुम गिरो नहीं…
उसे पाने के लिए झुको मत।”

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