शनिवार, 6 दिसंबर 2025

इश्क से आगे की जिंदगी

इश्क़ खत्म हुआ तो ऐसा लगा
जैसे दिल की आख़िरी साँस निकल गई हो,
पर सच तो ये है—
इश्क़ के बुझने के बाद ही
ज़िंदगी की पहली लौ जलती है।

पहले मैं किसी की धड़कन में
अपना नाम ढूंढती थी,
अब मैं अपनी साँसों में
अपना वजूद महसूस करती हूँ।

कल तक जो दरवाज़ा किसी और के लिए खुला था,
आज वही दरवाज़ा
मेरे अपने लौट आने के लिए खुला है।

इश्क़ से आगे की जिंदगी
अजनबी नहीं—
बस थोड़ी खामोश है,
थोड़ी समझदार है,
थोड़ी सँभली हुई…
और पूरी मेरी है।

अब मैं रोती भी हूँ तो खुलकर,
हँसती भी हूँ तो सच्चे मन से,
क्योंकि दर्द का हिसाब कोई नहीं ले रहा,
और खुशी का प्रमाण कोई नहीं मांग रहा।

अब रातों में जागना इश्क़ की मजबूरी नहीं,
खुद के सपनों की मेहनत है।
अब धड़कनें किसी के कदम से नहीं मिलती—
लक्ष्य की ओर बढ़ते कदमों से ताल मिलाती हैं।

अब किसी के लौट आने का इंतज़ार नहीं,
और खुद के रुक जाने का डर नहीं।

इश्क़ से आगे की जिंदगी
मोहब्बत के बिना नहीं है—
बस उस मोहब्बत में
अब एक चेहरा नहीं,
पूरा खुद का संसार है।

मैं किसी का सब कुछ बनकर
खुद से खाली नहीं रहना चाहती,
इस बार मैं अपनी भी बनूँगी—
अपने सपनों की,
अपने वजूद की,
अपने प्यार की।

जो लोग चले गए
उन्होंने सिर्फ एक किरदार छोड़ा है—
कहानी नहीं।
कहानी तो अब शुरू हुई है—
जहां मैं टूटती नहीं,
बल्कि खिलती हूँ।

इश्क़ खूबसूरत था
मगर जिंदगी उससे छोटी नहीं—
और मैंने अब तय कर लिया है…
किसी दिन मेरा प्यार मेरे लिए आए या न आए,
पर मेरी जिंदगी हमेशा मेरी रहेगी।

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