अपनी हर धड़कन बहा दी,
कितनी ख़्वाहिशें थीं —
सबको मोती समझकर समंदर में डुबा दी।
तैरना आता था मगर
मैंने डूबना ज़्यादा पसंद किया,
क्योंकि इश्क़ वही है न…
जहां किनारे नहीं, सिर्फ़ टूटे हुए वादों का पानी ठंडा-सा पिया।
वो पलकों पर ठहरा एक ख्वाब
मुट्ठी में पानी की तरह फिसल गया,
और मैं पूछती ही रह गई—
किसने किसे खोया… और कौन किसमें बदल गया?
सच्चाई ये है
कि मैंने बहुत कुछ छोड़कर बहुत थोड़ा पाया,
होठों पर खामोशी थी
दिल ने मगर रोज़ यही सिखाया—
“प्यार के बाद भी ज़िंदगी बची रहे,
तो उसे जी लेना गुनाह नहीं… दगा नहीं।”
दिल के रेगिस्तान में
मैंने बारिश के होने का इंतज़ार किया,
कोई आया भी तो…
बस नमक में भीगी यादों का उपहार दिया।
पर शिकायत मेरी आज भी अधूरी है…
हर शोर के बाद भी
एक सवाल चुप बैठा है मेरे भीतर—
“मैंने इतनी मोहब्बत करी…
तो आखिर क्या मिला मुझको खुद से जीते जी हारकर?”
जिंदगी ने बस कंधे उचका दिए,
कहा— “इश्क़ किस्मत वालों को मिलना होता है,
और मोहब्बत करने वाले…
ज्यादातर तन्हाई में खिलना होता है।”
बस तभी समझ आया—
मेरी तलाश मोहमल नहीं थी,
मेरी तड़प गुनाह नहीं थी,
मैंने खोया नहीं… मैं बदल गई थी।
अब दरिया में फिर कूदना होगा
पर डूबने को नहीं —
अपने भीतर दुनियाओं को ढूंढने को,
अपनों से पहले खुद से जुड़ने को।
इश्क़ से शिकायत अब नहीं…
इश्क़ तो खूबसूरत था,
शिकायत बस इतनी है —
कि मैंने खुद को आख़िरी समझकर
किसी को पहली मोहब्बत बना डाला।
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