सोमवार, 1 दिसंबर 2025

दुख___जो मैने जिया न कि झेला


एक अरसा चाहा है उसे मैंने…
इतना चाहा कि अब एहसास होता है—
शायद वो व्यक्ति नहीं था,
एक पाठ था।

वो प्रेम नहीं,
मेरी चेतना का धक्का था,
जो मुझे जगाने आया था—
नींद कितनी गहरी थी मेरी
कि दिल टूटे बिना मैं जाग नहीं पाती।

लोग कहते हैं—
दुख इंसान को गिराता है।
पर सच यह है—
दुख वही चुनता है
जिसके भीतर उठने की क्षमता हो।

और मैंने भी दुख को
रोकर नहीं,
समझकर जिया है।

क्योंकि अगर मैं भूल जाती,
तो सीखती क्या?
अगर छोड़ देती,
तो बदलती कैसे?

कभी-कभी सोचती हूँ—
कि वो इंसान जिसका नाम अब नहीं लेती,
वो वही था,
जो मुझे मेरी असल सूरत दिखाने आया था।
उसके जाने में ही
मेरी आत्मा लौट आई।

दुख के बिना जीवन
उथला होता,
दर्द के बिना प्रेम
सतही होता,
और खोने के बिना
स्वत्व का जन्म नहीं होता।

हर आँसू ने
मेरे भीतर एक दरवाज़ा खोला—
जहाँ मैं अपने आप से मिली,
जहाँ मुझे जाना कि
“मनुष्यता, कमजोरी नहीं होती—
संवेदना होती है।”

आज जो लोग दूर हैं,
वे रहकर भी,
कभी मेरे इतने पास नहीं थे,
जितना वह दुख—
जो मेरे अकेलेपन में
मेरा सहचर बना रहा।

उसने ही सिखाया—
कि आत्मा का घर
किसी दूसरे के पास नहीं होता।
जो भीतर है
उसे बाहर ढूंढना भूल है।

और तब समझ आया—
मैं उस प्रेम से लिपटी नहीं थी,
मैं अपनी ही ज़रूरत से बंधी थी।

जिस दिन
चाहत टूटकर भी खत्म नहीं हुई,
मैंने जाना—
चाहत बंधन नहीं,
अनुभूति होती है।

और अनुभूतियाँ
छोड़ी नहीं जातीं—
बड़ी हो जाती हैं।

तो हाँ…
एक अरसा चाहा है उसे मैंने,
पर अब समझ में आता है—
कि वो व्यक्ति नहीं,
मेरा पाला हुआ दुख नहीं,
बल्कि
मेरी परिपक्वता है।

वो अब घाव नहीं,
आत्मज्ञान है।

अब वह अंदर जलता नहीं,
अंदर रोशनी फैलाता है।

क्योंकि
कुछ दुख मरते नहीं—
वे ध्यान बन जाते हैं।

कुछ प्रेम लौटते नहीं—
वे अस्तित्व के भीतर
स्थिर हो जाते हैं।

और कुछ बिछड़नें
खत्म नहीं होतीं—
वे जन्म देती हैं
एक नई स्त्री को,
जो अब प्रेम करती है—
पर अपेक्षा नहीं रखती,
जो अब जुड़ती है—
पर खोती नहीं,
जो अब मुस्कुराती है—
और मुस्कान का कारण
खुद होती है।

इसलिए कहती हूँ—
एक अरसा चाहा है उसे मैंने,
और आज जानती हूँ—
मैंने कभी व्यक्ति को नहीं चाहा,
मैंने उस अनुभव को चाहा
जिसने मुझे “मैं” बनाया।

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