शनिवार, 6 दिसंबर 2025

अनुभवो के आगे

अनुभवों के आगे
शब्द अक्सर छोटे पड़ जाते हैं,
जैसे समुद्र के आगे रेत की रेखाएँ फीकी पड़ जाती हैं।
हर साँस, हर ठोकर, हर मुस्कान
कुछ कहती है जो कोई शब्द नहीं कह पाता।

हम चलते हैं रास्तों पर
जहाँ खामोशी भी अपनी कहानी कह देती है,
जहाँ आँखों की आभा
कभी खुशी की लहर, कभी दर्द की तड़प बन जाती है।

कभी किसी पल में
हँसी हमारे होंठों पर बसी रहती है,
लेकिन दिल कहता है
और भी कुछ, बहुत कुछ…
जो शब्दों की शक्ल नहीं ले पाता।

अनुभवों के आगे
साँसें भी छोटा पड़ जाता हैं,
हर एहसास इतना भारी,
कि शब्दों की दुनिया
उसके भार को उठाने में असमर्थ हो जाती है।

फिर भी हम लिखते हैं, बोलते हैं,
जितना शब्द कह सकें, कह देते हैं,
और बाकी…
बाकी खामोशी में सहेज लेते हैं,
अनुभवों की गहराई में,
जहाँ शब्द कभी पहुँच नहीं पाते।

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