जब देह नहीं, संवेदना जम जाती है,
आँखें शिकायत छोड़ कर
मौन की शिला बन जाती हैं—
उस दिन तुम इंसान नहीं रहते,
पूजा की वस्तु हो जाते हो।
क्योंकि इस सभ्यता को
जीते-जागते हृदय से डर लगता है,
यहाँ प्रेम की परंपरा
पत्थरों के चरण छूकर निभाई जाती है।
जिसने उम्र भर
प्रेम को हथेली में थामे रखा,
और बदले में
सिर्फ़ ठंडे उत्तर पाए—
उसकी पलकों पर
इंतज़ार जमता गया,
लहू की जगह
संयम बहने लगा,
और एक दिन
वह मरकर नहीं,
समझौते करके
देवता बना दिया गया।
अब लोग वहाँ आते हैं
अपने प्रेम की कमी लेकर,
माथा टेकते हैं
उस पत्थर के आगे—
जिसके सामने
जीते-जी किसी ने
एक साँस की कीमत नहीं समझी।
विडंबना देखो—
जो इंसान रहते हुए
सुनने योग्य नहीं था,
उसकी चुप्पी के नीचे
अब मन्नतों की अर्ज़ियाँ
दबाई जाती हैं।
इस युग में प्रेम
पाने की नहीं,
सहने की साधना है—
यहाँ जिससे प्रेम हो जाए,
उसे अंततः
पत्थर होना ही पड़ता है।
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