सोमवार, 1 दिसंबर 2025

जागते ख्वाबों के दर्शन

सोए तो दिल में एक जहाँ उग आया,
जैसे आत्मा ने शरीर से अलग होकर कोई सृष्टि रच डाली हो —
जहाँ इच्छा ही ईश्वर थी,
और संभावना ही नियति।

अँधेरी रात ने बताया,
कि मन के भीतर भी एक ब्रह्मांड है,
जहाँ हर खोया हुआ पल फिर से मिल सकता है,
जहाँ आँसू भी तारे बन सकते हैं,
और टूटन भी गीत।

पर सुबह —
सुबह ने सारा हिसाब पलट दिया,
आँखें खुलीं तो अहसास हुआ
कि पलकें केवल नींद से नहीं भारी थीं,
वे अधूरे सपनों की धूल से ढकी थीं।

कितना विचित्र है ना?
हम सपनों में वह सब जी लेते हैं
जिसे जीवन में जीने से डरते हैं।
और जीवन में वह सब सह लेते हैं
जिससे सपनों में गुज़रना भी असंभव लगता है।

तभी समझ आया —
ख्वाब झूठे नहीं होते,
बस वे अधूरे होते हैं —
क्योंकि हम उन्हें नींद पर छोड़ देते हैं,
कर्म पर नहीं।

सपना भाग्य नहीं — संकेत होता है;
दिल में बसा “जहाँ”
ज़मीन पर तभी बनता है
जब आत्मा इच्छा से आगे बढ़कर
साहस को ईश्वर मान ले।

तभी एक प्रश्न भीतर उठा —
ख्वाब टूटे थे, या हम?
और भीतर से उत्तर आया —
ख्वाब कभी नहीं टूटते,
वे केवल नए रास्तों में बदल जाते हैं।

अब जो सुबह आती है,
मैं आँखों से धूल नहीं झाड़ती,
मैं सपनों को जगाती हूँ।
क्योंकि असली जागना
पलकों के उठने से नहीं,
इच्छाओं के उठ खड़े होने से होता है।

और जिस दिन मन सच में जाग जाएगा,
उस दिन सपनों का “जहाँ”
दिल में नहीं —
दुनिया में भी नज़र आएगा।

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